-- जब से लोगों को मिला, नया-नवेला साल। तब से सरदी बढ़ गयी, बिगड़ गये हैं हाल।। -- सूरज है शरमा रहा, कुहरा चारों ओर। शीतल हुई दुपहरी, शीतल ही है भोर।। -- लोग लगाकर टकटकी, तकते हैं आकाश। शहर और देहात में, सब हो रहे निराश।। -- बीत गयी है लोहड़ी, छाया है उल्लास। बढ़े हुए दिनमान का, अभी नहीं आभास।। -- मकर लग्न में आ गये, अब सूरज भगवान। धीरे-धीरे बढ़ रहा, भारत में दिनमान।। -- आने वाला देश में, अब फिर से ऋतुराज। होता है सबसे सुखद, वासन्ती अन्दाज।। -- लगं चहकने बाग में, अब तो कलियाँ-फूल। जंगल में हँसने लगे, कण्टक वृक्ष बबूल।। -- |
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बहुत बढ़िया सर!
जवाब देंहटाएंअति सराहनीय रचना।
जवाब देंहटाएंमौसम को परिभाषित करते शानदार दोहे ।
जवाब देंहटाएंआने वाला देश में, अब फिर से ऋतुराज।
जवाब देंहटाएंहोता है सबसे सुखद, वासन्ती अन्दाज।।
वाह क्या खूब कहा आपने बहुत ही सुंदर दोहे
वसंत के स्वागत में सुंदर रचना
जवाब देंहटाएंअति सुन्दर सृजन ।
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