चाँदी
की थाली में, सोने की चम्मच से खाने वाले। महलों
में रहने वाले, करते घोटालों पर घोटाले।। गधे
बन गये अरबी घोड़े, नाम
बड़े हैं दर्शन थोड़े, एसी
में अय्यासी करते, कुछ
जननायक बहुत निगोड़े, खादी
की केंचुलिया पहने, बैठे विषधर काले-काले। महलों
में रहने वाले, करते घोटालों पर घोटाले।। कल
तक थे जितने नालायक, उनमें
से कुछ आज विधायक, सौदों
में खा रहे दलाली, ये
स्वदेश के भाग्यविनायक, लूट
रहे भोली जनता को, बनकर जन-गण के रखवाले। महलों
में रहने वाले, करते घोटालों पर घोटाले।। भावनाओं
को जब भड़काते, तब
मुद्दे भरपूर भुनाते, कैसे
क़ायम रहे एकता, चाल
दोहरी ये अपनाते, सत्ता
पर क़बिज़ रहने को, बन जाते हैं भोले-भाले। महलों में रहने वाले करते, घोटालों पर घोटाले।। |
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नमस्ते,
जवाब देंहटाएंआपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा सोमवार (31-01-2022 ) को 'लूट रहे भोली जनता को, बनकर जन-गण के रखवाले' (चर्चा अंक 4327) पर भी होगी। आप भी सादर आमंत्रित है। 12:01 AM के बाद प्रस्तुति ब्लॉग 'चर्चामंच' पर उपलब्ध होगी।
चर्चामंच पर आपकी रचना का लिंक विस्तारिक पाठक वर्ग तक पहुँचाने के उद्देश्य से सम्मिलित किया गया है ताकि साहित्य रसिक पाठकों को अनेक विकल्प मिल सकें तथा साहित्य-सृजन के विभिन्न आयामों से वे सूचित हो सकें।
यदि हमारे द्वारा किए गए इस प्रयास से आपको कोई आपत्ति है तो कृपया संबंधित प्रस्तुति के अंक में अपनी टिप्पणी के ज़रिये या हमारे ब्लॉग पर प्रदर्शित संपर्क फ़ॉर्म के माध्यम से हमें सूचित कीजिएगा ताकि आपकी रचना का लिंक प्रस्तुति से विलोपित किया जा सके।
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
#रवीन्द्र_सिंह_यादव
लाजवाब प्रस्तुति!
जवाब देंहटाएंयह रचना गाल पर तमाचा है दागी विधायकों और प्रत्याशियों के!
सादर
🙏
वाह ...
जवाब देंहटाएंकमाल की व्यंग धार है ... मेरा प्रणाम आपको ...
वाह!बहुत खूब।
जवाब देंहटाएंसादर
सीधा तीक्ष्ण प्रहार करती अप्रतिम रचना ।
जवाब देंहटाएंबहुत सुंदर।
बिषधरों पर कठोर प्रहार।
जवाब देंहटाएंवाह!बहुत खूब आदरणीय ।
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