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बुड्ढों के हैं ढंग निराले
बूढ़े हैं ज़वान दिल वाले
आये जवानी हाय कहाँ से
अंग हो गये ढीले-ढाले
घुटने थके-जोड़ दुखते हैं
फिर भी इनके मन मतवाले
नकली दाँत-आँख भी नकली
चेहरे हुए झुर्रियों वाले
साली अब भी अच्छी लगतीं
नहीं सुहाते इनको साले
अंकल (चाचा) सम्बोधन भाता
है
बाबा सुन कर आँख निकाले
चाहे चाँद भले गंजी हो
बाल किए हैं फिर भी काले
"रूप" देखकर राल टपकती
इनको तो अब राम संभाले
|
| "उच्चारण" 1996 से समाचारपत्र पंजीयक, भारत सरकार नई-दिल्ली द्वारा पंजीकृत है। यहाँ प्रकाशित किसी भी सामग्री को ब्लॉग स्वामी की अनुमति के बिना किसी भी रूप में प्रयोग करना© कॉपीराइट एक्ट का उलंघन माना जायेगा। मित्रों! आपको जानकर हर्ष होगा कि आप सभी काव्यमनीषियों के लिए छन्दविधा को सीखने और सिखाने के लिए हमने सृजन मंच ऑनलाइन का एक छोटा सा प्रयास किया है। कृपया इस मंच में योगदान करने के लिएRoopchandrashastri@gmail.com पर मेल भेज कर कृतार्थ करें। रूप में आमन्त्रित कर दिया जायेगा। सादर...! और हाँ..एक खुशखबरी और है...आप सबके लिए “आपका ब्लॉग” तैयार है। यहाँ आप अपनी किसी भी विधा की कृति (जैसे- अकविता, संस्मरण, मुक्तक, छन्दबद्धरचना, गीत, ग़ज़ल, शालीनचित्र, यात्रासंस्मरण आदि प्रकाशित कर सकते हैं। बस आपको मुझे मेरे ई-मेल roopchandrashastri@gmail.com पर एक मेल करना होगा। मैं आपको “आपका ब्लॉग” पर लेखक के रूप में आमन्त्रित कर दूँगा। आप मेल स्वीकार कीजिए और अपनी अकविता, संस्मरण, मुक्तक, छन्दबद्धरचना, गीत, ग़ज़ल, शालीनचित्र, यात्रासंस्मरण आदि प्रकाशित कीजिए। |
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बुधवार, 6 मार्च 2013
"बूढ़ी ग़ज़ल-हास्य" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
"खुशियों का परिवेश" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
|
रोज सुबह
सन्देश आपका, जब हमको मिल जाता
है।
मन-उपवन का हर
कोना, तब खिलकर मुस्काता है।।
जीवन कैसे
जियें? यही सच्चे
साथी सिखलाते हैं।
मर्म कर्म का
हमें, हमारे शुभचिन्तक
बतलाते हैं।
साथी पथ पर बढ़ने की जब सच्ची राह दिखाता है।
मन-उपवन का हर
कोना, तब खिलकर मुस्काता है।।
दूर देश से
आयी तितली, सोई कली जनाने
को,
उठो सवेरा हुआ-समेटो
उगते हुए खज़ाने को,
कलिकाओं को
सुमन बनाने को, भँवरा मंडराता
है।
मन-उपवन का हर
कोना, तब खिलकर मुस्काता है।।
बाँटो प्यार
सभी को, ये जीवन तो
बहुत जरा सा है,
अमृत पाने की, सबके मन में होती अभिलाषा है,
लेकिन जिसने
पिया गरल, वो महादेव
कहलाता है।
मन-उपवन का हर
कोना, तब खिलकर मुस्काता है।।
जब हम आते हैं दुनिया में, सभी बधायी
देते हैं,
अनजानी सी
मूरत में, हम बचपन को पा
लेते हैं,
खुशियों का
परिवेश, जगत में सबको
बहुत सुहाता है।
मन-उपवन का हर
कोना, तब खिलकर मुस्काता है।।
कल मेरे पौत्र प्राञ्जल की 14वीं वर्षगाँठ थी! इस अवसर पर प्रिय प्राञ्जल को दिल की गहराइयों से शुभकामनाएँ और आशीर्वाद! -- रचा-बसा था उस समय, होली का त्यौहार। पौत्ररत्न के रूप में, मिला हमें उपहार।। -- जन्मदिवस पर आपको, देते हम आशीष। पढ़-लिखकर बन जाइए, जल्दी से वागीश।। |
सोमवार, 4 मार्च 2013
"दोहे-पलाश के फूल" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
♥ दोहा सप्तक ♥
सबके लिए बसन्त का, मौसम है अनुकूल।
फागुन में मन मोहते, ये पलाश के फूल।१।
अंगारा सेमल हुआ, वन में खिला पलाश।
मन के उपवन में उठी, भीनी मन्द-सुवास।२।
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सरसों
फूली खेत में, पीताम्बर को धार।
देख
अनोखे रूप को, भ्रमर करे गुंजार।३।
कुदरत ने पहना दिये, नवपल्लव परिधान।
भक्त मन्दिरों में करें, हर-हर, बम-बम गान।४।
खुश हो बेरी दे रही, बेरों का उपहार।
इन बेरों में है छिपा, राम लखन का प्यार।५।
गेंहूँ
लहराने लगे, बाली पाकर आज।
मस्ती
और तरंग में, डूबा सकल समाज।६।
मौसम में उन्माद की, छाई हुई उमंग।
लोगों पर चढ़ने लगा, अब होली का रंग।७।
|
"दोहे-व्यर्थ न समय गवाँइए" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
व्यर्थ न समय
गवाँइए, इससे मुँह मत
फेर।१।
समय-समय की
बात है, समय-समय के
ढंग।
जग में होते
समय के, बहुत निराले
ढंग।२।
पल-पल में है
बदलता, सरल कभी है
वक्र।
रुकता-थकता
है नहीं, कभी समय का
चक्र।३।
समय न करता
है दया, जब अपनी पर
आय।
ज्ञानी-ध्यानी-बली
को, देता धूल
चटाय।४।
गया समय आता
नहीं, करनी को कर
आज।
मत कर
सोच-विचार तू, करले अपने
काज।५।
|
रविवार, 3 मार्च 2013
"गज़ल-भरोसा कर लिया मेंने" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
आज एक पुरानी डायरी मिली
उसमें ये गज़ल मिल गई!
आपके साथ साझा कर रहा हूँ
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बिना
जाँचे-बिना परखे, भरोसा कर लिया
मेंने
खुशनुमा
ज़िन्दग़ी में, काम कैसा कर
लिया मैंने
मुझे मालूम
क्या था, हर अदा उसकी
छलावा थीं
हसीं आग़ाज का, अन्ज़ाम कैसा कर लिया
मैंने
ज़लालत झेलकर भी, जी रहे ज़िन्दादिली से हम
सिकन्दर नाम को
गुमनाम कैसा कर लिया मैंने
किया है प्यार
तो उसको, निभायेंगे
उम्रभर हम
तुम्हारी आशिकी
में नाम कैसा कर लिया मैंने
दिलो-जाँ से
फिदा हूँ मैं, तुम्हारे
"रूप" की खातिर
जहाँ में नाम
को, बदनाम कैसा कर
लिया मैंने
|
शनिवार, 2 मार्च 2013
"वीराना चमन" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
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खो गये जाने
कहाँ सारे सुमन।
हो गया है
आज वीराना चमन।।
आज क्यों बंजर हुई अपनी धरा,
लील ली
किसने यहाँ की उर्वरा,
अब यहाँ
कैसे उगायें धान्य-धन।
हो गया है
आज वीराना चमन।।
आज गंगा भी
विषैली हो गयी,
पतित-पावन
धार मैली हो गयी,
अब यहाँ
कैसे करें हम आचमन?
हो गया है
आज वीराना चमन।।
देशभक्तों
का नहीं कुछ मान है,
हो रहा
गद्दार का सम्मान है,
अब कहाँ से
आयेगा चैनो-अमन?
हो गया है
आज वीराना चमन।।
घूस देकर
देश की सरकार को,
अब विदेशी आ
गये व्यापार को,
हो रहा
बेरोज़गारों का दमन।
हो गया है
आज वीराना चमन।।
दासता का पथ
नहीं अब दूर है,
दम्भ में
शासक बहुत ही चूर है,
कौन माता का
करेगा अब नमन?
हो गया है
आज वीराना चमन।।
|
शुक्रवार, 1 मार्च 2013
"आँसू-कुछ दोहे" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
|
मोती होता आँख का, सबके लिए अमोल।
उसके लिए बहाइए, जिसके सच्चे बोल।१।
मत रोना उसके लिए, जो करता किल्लोल।
आँसू हैं उसके लिए, जो दिल को दे खोल।२।
रखना बहुत सँभाल के, ये मोती अनमोल।
सारे जग के सामने, यही खोलता पोल।३।
आँसू रहता आँख में, चेहरे पर मुस्कान।
एक दिखाता दर्द को, दूजा हरे थकान।४।
दुःख और अनुराग की, होती कथा विचित्र।
लेकिन हैं हर हाल में , ये दोनों ही मित्र।५।
सागर से कम है नहीं, आँसू का अस्तित्व। आँसू का संसार में, होता है वर्चस्व।६। |
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