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शनिवार, 29 अप्रैल 2017

दोहे "बित्ते भर की जीभ" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)


समझदार होती अगर, मुख में घिरी जबान।
करते बत्तीस दाँत क्यों, रखवाली दरबान।।
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अगर लगाई जीभ पर, मन ने नहीं लगाम।
उलटी-ओछी बात से, मच जाता कुहराम।।
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रसना तो रस के लिए, कर देती मजबूर।
वाणी के ही घाव का, बन जाता नासूर।।
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जिसने जग में कर लिया, वाणी पर अधिकार।
कर लेंगे उसको सभी, मन से अंगीकार।।
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बित्ते भर की जीभ से, अपने बनते गैर।
बिना मोल बिन भाव के, हो जाता है बैर।।
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कोमल है जब जीभ तो, बोलो कोमल बोल।
सम्बन्धों के खेल में, वाणी है अनमोल।।
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रसना में जिनके नहीं, रस का हो सम्बन्ध।
कुसुम काग़ज़ी हों अगर, कैसे आये गन्ध।।
  

2 टिप्‍पणियां:

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