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शुक्रवार, 7 अप्रैल 2017

दोहे "हुए हौसले पस्त" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

झुकी पत्तियाँ पेड़ की, करती क्रन्दन आज। 
गरमी में बारिश हुई, सहमा देश-समाज।१।
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धरा-गगन में हो रहा, बेमौसम माहौल। 
चपला करती गर्जना, बादल बोले बोल।२।
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उमड़-घुमड़कर आ रहे, अब नभ में घनश्याम। 
फसलों का भी हो गया, अब तो काम तमाम।३।
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गेहूँ की है दुर्दशा, महँगाई की मार।
जीवनयापन का यहाँ, खिसक रहा आधार।४।
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पानी की जब चाह थी, लपटें आयीं पास।
जलते अधरों की कभी, नहीं बुझी थी प्यास।५।
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बात-बात में हो रही, आपस में तकरार।
प्यार-प्रीत की राह में, आया है व्यापार।६।
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बैठा जीवन शाख पे, पाखी गाता गीत।
बीते युग को याद कर, बजा रहा संगीत।७।
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बीज उगा जब धरा में, शुरू हो गया चक्र।
ईश्वर भी करने लगा, अपनी भौहें वक्र।८।
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कदम-कदम पर सुलगते, जीवन में अंगार।
अश्कों से कैसे बुझें, ज्वाला के अम्बार।९।
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राजनीति की बिछ रहीं, चारों ओर बिसात।
आम आदमी पर पड़ी, केवल शह औ' मात।१०।
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सब अपने झण्डे लिए, डण्डे रहे सँभाल।
जनता को ठग कर भरा, अपने घर में माल।११।
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सपन सलोने नैन में, आते हैं दिन-रात।
लेकिन सच होती नहीं, इन सपनों की बात।१२।
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महँगाई की मार से, जन-जीवन है त्रस्त।
निर्धन, श्रमिक-किसान के, हुए हौसले पस्त।१३।
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नौका लहरों में फँसी, बेबस खेवनहार।
नाविक अब ऐसे कहाँ, जो ले जाये पार।१४।

1 टिप्पणी:

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