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मंगलवार, 11 अप्रैल 2017

दोहे "पवनपुत्र हनुमान" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री ' मयंक')

 
धीर-वीर, रक्षक प्रबल, बलशाली-हनुमान।
जिनके हृदय-अलिन्द में, रचे-बसे श्रीराम।।
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महासिन्धु को लाँघकर, नष्ट किये वन-बाग।
असुरों को आहत किया, लंका मे दी आग।।
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कभी न टाला राम का, जिसने था आदेश।
सीता माता को दिया, रघुवर का सन्देश।।
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लछमन को शक्ति लगी, शोकाकुल थे राम।
बूटी लाने पवनसुत, पहुँचे पर्वत धाम।।
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संजीवन के शैल को, उठा लिया तत्काल।
बूटी खा जीवित हुए, दशरथ जी के लाल।।
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बिगड़े काम बनाइए, बनकर कृपा निधान।
कोटि-कोटि वन्दन तुम्हे, पवनपुत्र हनुमान।। 
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हनुमान जयन्ती की
सभी भक्तों को बहुत-बहुत शुभकामनाएँ।

1 टिप्पणी:

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