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गुरुवार, 6 अप्रैल 2017

दोहे "लोगों का आहार" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

माँ के चेहरे पर रहे, सहज-सरल मुसकान।
माता से बढ़कर नहीं, कोई देव महान।।
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व्रत-तप-पूजन के लिए, आते हैं नवरात।
माँ को मत बिसराइए, कैसे हों हालात।।
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बिना अर्चना के नहीं, मिलता है वरदान।
प्रतिदिन करना चाहिए, माता का गुणगान।।
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जय दुर्गा नवरात में, बोल रहे थे लोग।
बाकी पूरे सालभर, मुर्गा का उपभोग।।
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जीभ चटाखे ले रही, होठों पर हरिनाम।
हिन्दू ज्यादा खा रहे, मौमिन हैं बदनाम।।
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नहीं क्षम्य के योग्य हैं, दोनों के ऐमाल।
रोजाना दोनों करें, झटका और हलाल।।
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कुछ को सूकर से घृणा, कुछ को गौ से प्यार।
सामिष भोजन से बढ़े, आपस में तकरार।।
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सुधर जाय यदि देश के, लोगों का आहार।
तब ही होगा वतन में, सब तबकों में प्यार।।
  

2 टिप्‍पणियां:

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