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सुर, नर, मुनि के ज्ञान की, जब ढल जाती धूप।
छत्र-सिंहासन के बिना, रंक कहाते भूप।।
बिना धूप के खेत में, फसल नहीं उग पाय।
बारिश-गरमी-शीत को, भुवनभास्कर लाय।।
शैल शिखर उत्तुंग पर, जब पड़ती है धूप।
हिमजल ले सरिता बहें, ले गंगा का रूप।।
नष्ट करे दुर्गन्ध को, शीलन देय हटाय।
पूर्व दिशा के द्वार पर, रोग कभी ना आय।।
खग-मृग, कोयल-काग को, सुख देती है धूप।
उपवन और बसन्त का, यह सवाँरती रूप।।
गेहूँ उगता ग़ज़ल सा, सरसों
करे किलोल।
बन्द गले के सूट में, ढकी
ढोल की पोल।।
मौसम आकर्षित करे, हमको अपनी ओर।
कनकइया डग-मग करे, होकर भावविभोर।।
कड़क नहीं माँझा रहा, नाज़ुक सी है डोर।
पतंग उड़ाने को चला, बिन बाँधे ही छोर।।
पत्रक जब पीला हुआ, हरियाली नहीं पाय।
जाने कब शाखाओं से, पके पान झड़ जाय।।
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सुप्रभात।
जवाब देंहटाएंसदाबहार दोहे।
सुप्रभात।
जवाब देंहटाएंसदाबहार दोहे।
सुन्दर दोहे
जवाब देंहटाएंलाजवाब ... सबहार दोहे हैं ...
जवाब देंहटाएं"पत्रक जब पीला हुआ, हरियाली नहीं पाय।
जवाब देंहटाएंजाने कब शाखाओं से, पके पान झड़ जाय।।"
वाह!
जी नमस्ते ,
जवाब देंहटाएंआपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा आज रविवार (२१-0६-२०२१) को 'कुछ नई बाते नये जमाने की सिखाना भी सीख'(चर्चा अंक- ४१०२) पर भी होगी।
आप भी सादर आमंत्रित है।
सादर
कृपया रविवार को सोमवार पढ़े।
जवाब देंहटाएंसादर
बहुत खूब।
जवाब देंहटाएंबेहतरीन दोहे आदरणीय
जवाब देंहटाएंगेहूँ उगता ग़ज़ल सा, सरसों करे किलोल।
जवाब देंहटाएंबन्द गले के सूट में, ढकी ढोल की पोल।।
नूतन उपमाओं युक्त सुंदर दोहे 🌹🙏🌹
कबीर की नीति से सार्थक दोहे।
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