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गुरुवार, 11 जनवरी 2018

दोहे "कुहरा चारों ओर" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


जब से लोगों को मिला, नया-नवेला साल।
तब से सरदी बढ़ गयी, बिगड़ गये हैं हाल।।

सूरज है शरमा रहा, कुहरा चारों ओर।
शीतल हुई दुपहरी, शीतल ही है भोर।।

लोग लगाकर टकटकी, तकते हैं आकाश।
शहर और देहात में, सब हो रहे निराश।।

पर्व लोहड़ी आ रहा, ले करके उल्लास।
बढ़े हुए दिनमान का, मगर नहीं आभास।।

मकर लग्न का कर रहे, इन्तजार सब लोग।
अच्छे दिन का जब बने, दुनिया में संयोग।।


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