"उच्चारण" 1996 से समाचारपत्र पंजीयक, भारत सरकार नई-दिल्ली द्वारा पंजीकृत है। यहाँ प्रकाशित किसी भी सामग्री को ब्लॉग स्वामी की अनुमति के बिना किसी भी रूप में प्रयोग करना© कॉपीराइट एक्ट का उलंघन माना जायेगा।

मित्रों!

आपको जानकर हर्ष होगा कि आप सभी काव्यमनीषियों के लिए छन्दविधा को सीखने और सिखाने के लिए हमने सृजन मंच ऑनलाइन का एक छोटा सा प्रयास किया है।

कृपया इस मंच में योगदान करने के लिएRoopchandrashastri@gmail.com पर मेल भेज कर कृतार्थ करें। रूप में आमन्त्रित कर दिया जायेगा। सादर...!

और हाँ..एक खुशखबरी और है...आप सबके लिए “आपका ब्लॉग” तैयार है। यहाँ आप अपनी किसी भी विधा की कृति (जैसे- अकविता, संस्मरण, मुक्तक, छन्दबद्धरचना, गीत, ग़ज़ल, शालीनचित्र, यात्रासंस्मरण आदि प्रकाशित कर सकते हैं।

बस आपको मुझे मेरे ई-मेल roopchandrashastri@gmail.com पर एक मेल करना होगा। मैं आपको “आपका ब्लॉग” पर लेखक के रूप में आमन्त्रित कर दूँगा। आप मेल स्वीकार कीजिए और अपनी अकविता, संस्मरण, मुक्तक, छन्दबद्धरचना, गीत, ग़ज़ल, शालीनचित्र, यात्रासंस्मरण आदि प्रकाशित कीजिए।

यह ब्लॉग खोजें

समर्थक

शनिवार, 13 जनवरी 2018

दोहे "तितली करती नृत्य" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

उत्तरायणी पर्व को, ले आया नववर्ष।
तन-मन में सबके भरा, कितना नूतन हर्ष।१।
--
आया है उल्लास का, उत्तरायणी पर्व।
झूम रहे आनन्द में, सुर-मानव-गन्धर्व।२।
--
जल में डुबकी लगाकर, पावन करो शरीर।
नदियों में बहता यहाँ, पावन निर्मल नीर।३।
--
जीवन में उल्लास के, बहुत निराले ढंग।
बलखाती आकाश में, उड़ती हुई पतंग।४।
--
तिल के मोदक खाइए, देंगे शक्ति अपार।
मौसम का मिष्ठान ये, हरता कष्ट-विकार।५।
--
उत्तरायणी पर्व के, भिन्न-भिन्न हैं नाम।
लेकर आता हर्ष ये, उत्सव ललित-ललाम।६।
--
सूर्य रश्मियाँ आ गयीं, खिली गुनगुनी धूप।
शस्य-श्यामला धरा का, निखरेगा अब रूप।७।
--
भुवनभास्कर भी नहीं, लेगा अब अवकाश।
कुहरा सारा छँट गया, चमका भानुप्रकाश।८।
--
अब अच्छे दिन आ गये, हुआ शीत का अन्त।
धीरे-धीरे चमन में, सजने लगा बसन्त।९।
--
रजनी आलोकित हुई, खिला चाँद रमणीक।
देखो अब आने लगे, युवा-युगल नज़दीक।१०।
--
पतझड़ का मौसम गया, जीवित हुआ बसन्त।
नवपल्लव पाने लगा, अब तो बूढ़ा सन्त।११।
--
पौधों पर छाने लगा, कलियों का विन्यास।
दस्तक देता द्वार पर, खड़ा हुआ मधुमास।१२।
--
रवि की फसलों के लिए, मौसम ये अनुकूल।
सरसों पर आने लगे, पीले-पीले फूल।१३।
--
भँवरा गुन-गुन कर रहा, तितली करती नृत्य।
खुश होकर करते सभी, अपने-अपने कृत्य।१४।
--
आज सार्थक हो गयी, पूजा और नमाज।
जीवित अब होने चला, जीवन में ऋतुराज।१५।

4 टिप्‍पणियां:

  1. सुन्दर और सामयिक रचना

    उत्तर देंहटाएं
  2. निमंत्रण पत्र :
    मंज़िलें और भी हैं ,
    आवश्यकता है केवल कारवां बनाने की। मेरा मक़सद है आपको हिंदी ब्लॉग जगत के उन रचनाकारों से परिचित करवाना जिनसे आप सभी अपरिचित अथवा उनकी रचनाओं तक आप सभी की पहुँच नहीं।
    ये मेरा प्रयास निरंतर ज़ारी रहेगा ! इसी पावन उद्देश्य के साथ लोकतंत्र संवाद मंच आप सभी गणमान्य पाठकों व रचनाकारों का हृदय से स्वागत करता है नये -पुराने रचनाकारों का संगम 'विशेषांक' में सोमवार १५ जनवरी २०१८ को आप सभी सादर आमंत्रित हैं। धन्यवाद !"एकलव्य" https://loktantrasanvad.blogspot.in/

    उत्तर देंहटाएं

केवल संयत और शालीन टिप्पणी ही प्रकाशित की जा सकेंगी! यदि आपकी टिप्पणी प्रकाशित न हो तो निराश न हों। कुछ टिप्पणियाँ स्पैम भी हो जाती है, जिन्हें यथासम्भव प्रकाशित कर दिया जाता है।

LinkWithin

Related Posts with Thumbnails