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सोमवार, 22 जनवरी 2018

दोहे "जीवित हुआ बसन्त" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

अच्छे दिन आने लगे, हुआ शीत का अन्त।
धीरे-धीरे चमन में, सजने लगा बसन्त।।

नदियों में बहने लगा, पावन निर्मल नीर।
जल में डुबकी लगाकर, निर्मल करो शरीर।।

जीवन में उल्लास के, बहुत निराले ढ़ंग।
बलखाती आकाश में, उड़ती हुई पतंग।।

सूर्य रश्मियाँ आ गयीं, खिली गुनगुनी धूप।
शस्य-श्यामला धरा का, निखरेगा अब रूप।।

कुहरा सारा छँट गया, चमका भानु-प्रकाश।
भुवन-भास्कर भी नहीं, लेगा अब अवकाश।।

रजनी आलोकित हुई, खिला चाँद रमणीक।
देखो अब आने लगे, युव-युगल नजदीक।।

पतझड़ का मौसम गया, जीवित हुआ बसन्त।
नव पल्लव पाने लगा, बूढ़ा बरगद सन्त।।

2 टिप्‍पणियां:

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