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रविवार, 28 जनवरी 2018

दोहे "नवपल्लव परिधान" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

प्रेम-प्रीत के रंग लेआया है ऋतुराज।
मना रहा है प्रणय दिनहोकर मस्त समाज।।
 
चोंच कपोत लड़ा रहेकरते दिल की बात।
मिलकर यापन कर रहेजन्म-ज़िन्दगी साथ।।
 
शाखाओं पर आ गयेनवपल्लव परिधान।
मौसम है मधुमास कापंछी गाते गान।।
 
फूलों-कलियों पर चढ़ाअब उपवन में रंग।
वासन्ती परिधान केबड़े निराले ढंग।।
 
सेमल पर छाये सुमनवन में खिला पलाश।
सूरज देता ऊर्जानिर्मल है आकाश।।
 
सबके लिए बसन्त का, मौसम है अनुकूल।
फागुन में मन मोहते, ये पलाश के फूल।।
 
अंगारा सेमल हुआ, वन में खिला कपास।
मन के उपवन में उठी, भीनी मन्द-सुवास।।
 
सरसों फूली खेत में, पीताम्बर को धार।
देख अनोखे रूप को, भ्रमर करे गुंजार।।
 
कुदरत ने पहना दिये, नवपल्लव परिधान।
गंगा तट पर हो रहा, शिवजी का गुणगान।।
 

2 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल सोमवार (29-01-2018) को "नवपल्लव परिधान" (चर्चा अंक-2863) पर भी होगी।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    राधा तिवारी

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