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सोमवार, 29 जनवरी 2018

दोहे "है सूरज भयभीत" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

नहीं हुआ है देश में, अभी शीत का अन्त।
कुहरे से इस साल तो, शीतल हुआ बसन्त।।

कुहरे-सरदी ने किये, कीर्तिमान सब ध्वस्त।
सूरज की गति देखकर, हुए हौसले पस्त।।

नहीं दिखाई दे रहा, वासन्ती संगीत।
कुहरे से इस साल तो, है सूरज भयभीत।।

सरदी हाड़ कँपा रही, बिगड़ गया परिवेश।
उत्तर भारत में अभी, कुहरे का है क्लेश।।

शीतलता की मार को, लोग रहे हैं झेल।
नहीं समझ में आ रहा, मौसम का ये खेल।।
  

2 टिप्‍पणियां:

  1. नहीं दिखाई दे रहा, वासन्ती संगीत।
    कुहरे से इस साल तो, है सूरज भयभीत।।

    हालात अभी भी ऐसे ही हैं.....
    सामयिक और वास्तविक....

    उत्तर देंहटाएं
  2. मौसम भी इंसान के तरह अजीबोगरीब होता जा रहा है
    बहुत अच्छी प्रस्तुति

    उत्तर देंहटाएं

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