जिन्हें नाज़ों से पाला था, वही आँखें दिखाते हैं हमारे दिल में घुसकर वो, हमें नश्तर चुभाते हैं जिन्हें अँगुली पकड़ हमने, कभी चलना सिखाया था जरा सा ज्ञान क्या सीखा, हमें पढ़ना सिखाते हैं -- भँवर में थे फँसे जब वो, हमीं ने तो निकाला था मगर अहसान के बदले, वही चूना लगाते हैं -- हुआ अहसास है अब ये, बड़ी है मतलबी दुनिया, गधे को बाप भी अपना, समय पर वो बनाते हैं -- खनक के देख कर जर की, दगा
देना रवायत है चमन में फूल को काँटे,
हमेशा ही सताते हैं -- बगावत करके लोगों ने,
उजाड़ा आशियाँ कैसे छिपे गैरों का पहलू में,
मुकद्दर आजमाते हैं -- नहीं है “रूप” से मतलब, नहीं है रंग की चिन्ता अगर चाँदी के जूते हो, तो सिर पर वो बिठाते हैं -- |
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जी नमस्ते,
जवाब देंहटाएंआपकी लिखी रचना शुक्रवार १ जुलाई २०२२ के लिए साझा की गयी है
पांच लिंकों का आनंद पर...
आप भी सादर आमंत्रित हैं।
सादर
धन्यवाद।
नमस्ते,
जवाब देंहटाएंआपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा शुक्रवार 01 जुलाई 2022 को 'भँवर में थे फँसे जब वो, हमीं ने तो निकाला था' (चर्चा अंक 4477) पर भी होगी। आप भी सादर आमंत्रित है। 12:01 AM के बाद आपकी प्रस्तुति ब्लॉग 'चर्चामंच' पर उपलब्ध होगी।
जीवन का यथार्थ दिखाता सराहनीय सृजन।
जवाब देंहटाएंसादर
जिन्हें नाज़ों से पाला था, वही आँखें दिखाते हैं
जवाब देंहटाएंहमारे दिल में घुसकर वो, हमें नश्तर चुभाते हैं
वाह!!!
कटु यथार्थ बयां करते लाजवाब दोहे।
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भँवर में थे फँसे जब वो, हमीं ने तो निकाला था
जवाब देंहटाएंमगर अहसान के बदले, वही चूना लगाते हैं
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हुआ अहसास है अब ये, बड़ी है मतलबी दुनिया,
गधे को बाप भी अपना, समय पर वो बनाते हैं
.. एकदम सही बात
बहुत खूबसूरत समयानुसार अभिव्यक्ति
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