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बुधवार, 6 जनवरी 2021

प्रीत का व्याकरण-गीत "तुम्हारे हाथों में" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

आसमान का छोर, तुम्हारे हाथों में।
कनकइया की डोर तुम्हारे हाथों में।।
--
लहराती-बलखाती, पेंग बढ़ाती है,
नीलगगन में ऊँची उड़ती जाती है,
होती भावविभोर तुम्हारे हाथों में।
कनकइया की डोर तुम्हारे हाथों में।।
--
वसुन्धरा की प्यास बुझाती है गंगा,
पावन गंगाजल करता तन-मन चंगा,
सरगम का मृदु शोर तुम्हारे हाथों में।।
कनकइया की डोर तुम्हारे हाथों में।।
--
उपवन में कलिकाएँ जब मुस्काती हैं,
भ्रमर और तितली को महक सुहाती है,
जीवन की है भोर तुम्हारे हाथों में।
कनकइया की डोर तुम्हारे हाथों में।।
--
प्रणय-प्रेम के बिना अधूरी पावस है,
बिन मयंक के छायी घोर अमावस है,
चन्दा और चकोर तुम्हारे हाथों में।
कनकइया की डोर तुम्हारे हाथों में।।
--

12 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 07.01.2021 को चर्चा मंच पर दिया जाएगा| आपकी उपस्थिति मंच की शोभा बढ़ाएगी
    धन्यवाद

    जवाब देंहटाएं
  2. कनकइया की डोर तुम्हारे हाथों में।।

    ग़ज़ब... क्या पंक्ति निकाली है आदरणीय 🙏
    साधुवाद
    🙏💐🙏

    जवाब देंहटाएं
  3. प्राकृति और प्रेम का आकर्षित गीत ...
    बहुत सुन्दर ...

    जवाब देंहटाएं
  4. सशक्त व प्रभावशाली लेखन - - नमन सह।

    जवाब देंहटाएं
  5. बहुत सुंदर पंक्तियाँ।

    जवाब देंहटाएं
  6. कोमल भावों से युक्त सुंदर रचना

    जवाब देंहटाएं
  7. वाह!, अभिनव उपमाएं।
    सुंदर गीत,सरस सृजन।

    जवाब देंहटाएं

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