आज प्रस्तुत है मेरी पसन्द का ईश्वर भक्ति का यह गीत! इसको अपने स्वर से सजाया है श्री योगेश दत्त आर्य ने- सारी स्रष्टि दुल्हिन सी सजी है! क्या अनोखी ये कारीगरी है?.... |
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गुरुवार, 7 अक्टूबर 2010
"मेरी पसन्द का गीत" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")
बुधवार, 6 अक्टूबर 2010
“बेजुबानों में जुबाने आ गईं..” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)
| पड़ गईं जब पेट में दो रोटियाँ, बेजुबानों में जुबानें आ गईं। बस गईं जब बीहड़ों में बस्तियाँ, चल के शहरों से दुकानें आ गईं। मन्दिरों में आरती होने लगीं, मस्जिदों में भी नमाजें आ गईं। कंकरीटों की फसल उगने लगी, नस्ल नूतन कहर ढाने आ गई। गगनचुम्बी शैल हिम तजने लगे, नग्नता सूरत दिखाने आ गईं। |
मंगलवार, 5 अक्टूबर 2010
“प्यारा भइया रूठ गया-देवदत्त प्रसून” (प्रस्तोता-डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)
| सहा न उससे झूठ गया। प्यारा भइया रूठ गया।। श्री देवदत्त “प्रसून” (श्री देवदत्त “प्रसून” जी साहित्य के धनी रहे हैं। आज प्रस्तुत है- हाकली छंद में रची हुई उनकी यह सुन्दर रचना।) |
| सहा न उससे झूठ गया। प्यारा भइया रूठ गया।। वह कितनी चालाकी से, माल सभी का लूट गया। प्यारा भइया रूठ गया।। तगड़ी घूस की ताकत थी, पहुँच के बल पर छूट गया। प्यारा भइया रूठ गया।। कच्चा धागा कोशिश का. इक झटके से टूट गया। प्यारा भइया रूठ गया।। प्रसून पापों का मटका, सत्य की चोट से फूट गया। प्यारा भइया रूठ गया।। |
सोमवार, 4 अक्टूबर 2010
"पाँच दोहे" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")
(1) मेघ अभी तक गगन में, खेल रहे हैं खेल। वर्षा के सन्ताप को, लोग रहे हैं झेल।। (2) कितना ही आगे बढ़े, मौसम का विज्ञान। लेकिन बन सकता नही, वो जग का भगवान।। (3) काव्य और साहित्य है, शब्दों से धनवान। शब्दों से होती सदा, मानव की पहचान।। (4) सरेआम बाजार में, अब बिकता ईमान। हत्या करने को चला, शायर की धनवान।। (5) विद्या पढ़ने का जिन्हें, नही मिला अधिकार। कूड़ा-करकट बीनते, वे बालक सुकुमार।। |
रविवार, 3 अक्टूबर 2010
“आज आकाश तारों भरा-डॉ.चन्द्र शेखर जोशी” (प्रस्तोता-डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)
आज आकाश तारों भरा ![]() |
| आज आकाश तारों भरा। मौन होकर निहारे धरा।। असंख्य अलौकिक दीप आतुर, दमकने दो ज्योति जरा। मौन होकर निहारे धरा।। एकाकी सप्तर्षि ने मुस्करा कर, आज किसका मन हरा। मौन होकर निहारे धरा।। छितरी-बिखरी सी आकाश गंगा, फैलाए आँचल जुगनुओं भरा। मौन होकर निहारे धरा।। बृहद्-विशाल, यह मायाज़ाल, मन है हर्षित, कदाचित् डरा। मौन होकर निहारे धरा।। मृत्यु रचती सदा जिन्दगी, है नमन मात्र आदर भरा। मौन होकर निहारे धरा।। |
शनिवार, 2 अक्टूबर 2010
“गांधी जी का आवास भी देखा!” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)
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आठ अक्टूबर 2008 को मेरा किसी समारोह में जाने का कार्यक्रम पहले से ही निश्चित था। समारोह/सम्मेलन दो दिन तक चला।
यूँ तो अहमदाबाद के कई दर्शनीय स्थलो का भ्रमण किया, परन्तु मुझे गांधी जी का साबरमती आश्रम देख कर बहुत अच्छा लगा।
10 अक्टूबर को मैं अपने कई साथियों के साथ। प्रातः 9 बजे आश्रम में पहुँचा। चार-पाँच घण्टे आश्रम मे ही गुजारे।
उसी समय की खपरेल से आच्छादित गांधी जी का आवास भी देखा। वही सूत कातने का अम्बर चरखा। उसके पीछे महात्मा जी का आसन। एक पल को तो ऐसा लगा जैसे कि गांधी जी अभी इस आसन पर बैठने के लिए आने वाले हों।
अन्दर गया तो एक अल्मारी में करीने से रखे हुए थे गान्धी जी के किचन के कुछ बर्तन।
छोटी हबेलीनुमा इस भवन में माता कस्तूरबा का कमरा भी देखा जिसके बाहर उनकी फोटो आज भी लगी हुई है।
इसके बगल में ही अतिथियों के लिए भी एक कमरा बना है।
इसके बाद बाहर निकले तो विनोबा जी की कुटी दिखाई पड़ी। इसे भी आज तक मूल रूप में ही सँवारा हुआ है।
आश्रम के पहले गेट के साथ ही गुजरात हरितन सेवक संघ का कार्यालय आज भी विराजमान है।
आश्रम के साथ ही साबर नदी की धारा भी बहती दिखाई दी। लेकिन प्रदूषण के मारे उसका भी बुरा हाल देखा।
कुल मिला कर यह लगा कि आश्रम में आने पर आज भी शान्ति मिलती है। सच पूछा जाये तो अहमदाबाद में साबरमती नदी के किनारे बने आश्रम में आज भी मोहनदास कर्मचन्द गांधी की आत्मा बसती है। |
शुक्रवार, 1 अक्टूबर 2010
“गांधी शत्-शत् तुम्हें प्रणाम!” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")
“मोहन दास कर्मचन्द गांधी” |
“मोहन दास कर्मचन्द गांधी” तुमको शत्-शत् मेरा प्रणाम। श्रद्धा-सुमन समर्पित तुमको, जग में अमर तुम्हारा नाम।। आत्म-संयमी, व्रतधारी की, महिमा को हम गाते हैं। राजनीति-पटु,महा-आत्मा को, हम शीश नवाते हैं।। तन-मन में रमे हुए गांधी, जैसे काशी और काबा हैं। भारत के जन,गण,मन में, रचते-बसते गांधी बाबा हैं।। शस्त्र अहिंसा का लेकर, तुमने अंग्रेज भगाया था। शान्ति प्रेम की लाठी से, भारत आजाद कराया था।। छुआ-छूत का भूत भगा, चरखे का चक्र चलाया था। सत्यमेव जयते का सबको, पावन पाठ पढ़ाया था।। आदर और श्रद्धा से लेते, हम बापू-गांधी का नाम। भक्ति-भाव से मिलकर बोलो, रघुपति राघव राजा राम।। |
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(श्री देवदत्त “प्रसून” जी साहित्य के धनी रहे हैं। 











