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बुधवार, 6 अक्तूबर 2010

“बेजुबानों में जुबाने आ गईं..” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)

पड़ गईं जब पेट में दो रोटियाँ,
बेजुबानों में जुबानें आ गईं।

बस गईं जब बीहड़ों में बस्तियाँ,
चल के शहरों से दुकानें आ गईं।

मन्दिरों में आरती होने लगीं,
मस्जिदों में भी नमाजें आ गईं।

कंकरीटों की फसल उगने लगी,
नस्ल नूतन कहर ढाने आ गई।

गगनचुम्बी शैल हिम तजने लगे,
नग्नता सूरत दिखाने आ गईं।

19 टिप्‍पणियां:

  1. इस गज़ल में गहरी व्यंजना है । 'नस्ल नूतन' का तो जवाब नहीं ।

    उत्तर देंहटाएं
  2. आह ग़ज़ल ! वाह ग़ज़ल !

    "बेजुबानों में ज़ुबाने आ गईं "
    इसमें से यदि भी निकाल जाये तो शायद और अधिक बेहतर होगा

    उत्तर देंहटाएं
  3. mynk saahb zindgi kaa jivnt udaahrn aapne alfaazon se gdh kr pesh kiya he bhut khub he aek ziondaa desh ki yhi dastaan he, akhtar khan akela ktoa rajsthan

    उत्तर देंहटाएं
  4. बस गईं जब बीहड़ों में बस्तियाँ,
    चल के शहरों से दुकानें आ गईं।


    कंकरीटों की फसल उगने लगी,
    नस्ल नूतन कहर ढाने आ गई।

    बहुत सटीक बात कही है ..सुन्दर अभिव्यक्ति

    उत्तर देंहटाएं
  5. बहुत संवेदनशील रचना है.... बिल्कुल सही बैठती है हमारे आज के तथाकथित विकसित समाज पर.....

    उत्तर देंहटाएं
  6. बहुत दूर का सोच लिए रचना |बधाई
    आशा

    उत्तर देंहटाएं
  7. जिन्दा बचे है जो , खुदा का शुक्र है,
    वर्ना, जिंदगी से बाहर आतें आ गयी !

    लिखते रहिये ....

    उत्तर देंहटाएं
  8. बेहतरीन अभिव्यक्ति...बधाई.


    __________________________
    "शब्द-शिखर' पर जयंती पर दुर्गा भाभी का पुनीत स्मरण...

    उत्तर देंहटाएं
  9. बस गईं जब बीहड़ों में बस्तियाँ,
    चल के शहरों से दुकानें आ गईं।

    बहुत ही सुन्‍दर .......भावमय प्रस्‍तुति ।

    उत्तर देंहटाएं
  10. ये होती है लयबद्ध अभिव्यक्ति………………और अपनी बात कहने का सही ढंग्……………बेहतरीन रचना।

    उत्तर देंहटाएं
  11. गगनचुम्बी शैल हिम तजने लगे,
    नग्नता सूरत दिखाने आ गईं।

    बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति, शास्त्री जी!

    उत्तर देंहटाएं
  12. बस गईं जब बीहड़ों में बस्तियाँ,
    चल के शहरों से दुकानें आ गईं ..


    बहुत बहुत बधाई इस रचना के लिए शास्त्री जी ..... बहुत कमाल की ग़ज़ल है ये ...

    उत्तर देंहटाएं

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