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शनिवार, 2 अक्तूबर 2010

“गांधी जी का आवास भी देखा!” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)

आठ अक्टूबर 2008 को मेरा किसी समारोह में जाने का कार्यक्रम पहले से ही निश्चित था। समारोह/सम्मेलन दो दिन तक चला।

यूँ तो अहमदाबाद के कई दर्शनीय स्थलो का भ्रमण किया, परन्तु मुझे गांधी जी का साबरमती आश्रम देख कर बहुत अच्छा लगा।

10 अक्टूबर को मैं अपने कई साथियों के साथ। प्रातः 9 बजे आश्रम में पहुँचा। चार-पाँच घण्टे आश्रम मे ही गुजारे।

उसी समय की खपरेल से आच्छादित गांधी जी का आवास भी देखा। वही सूत कातने का अम्बर चरखा। उसके पीछे महात्मा जी का आसन। एक पल को तो ऐसा लगा जैसे कि गांधी जी अभी इस आसन पर बैठने के लिए आने वाले हों।

अन्दर गया तो एक अल्मारी में करीने से रखे हुए थे गान्धी जी के किचन के कुछ बर्तन।

छोटी हबेलीनुमा इस भवन में माता कस्तूरबा का कमरा भी देखा जिसके बाहर उनकी फोटो आज भी लगी हुई है।

इसके बगल में ही अतिथियों के लिए भी एक कमरा बना है।

इसके बाद बाहर निकले तो विनोबा जी की कुटी दिखाई पड़ी। इसे भी आज तक मूल रूप में ही सँवारा हुआ है।

आश्रम के पहले गेट के साथ ही गुजरात हरितन सेवक संघ का कार्यालय आज भी विराजमान है।

आश्रम के साथ ही साबर नदी की धारा भी बहती दिखाई दी। लेकिन प्रदूषण के मारे उसका भी बुरा हाल देखा।

कुल मिला कर यह लगा कि आश्रम में आने पर आज भी शान्ति मिलती है।

सच पूछा जाये तो अहमदाबाद में साबरमती नदी के किनारे बने आश्रम में आज भी मोहनदास कर्मचन्द गांधी की आत्मा बसती है।

17 टिप्‍पणियां:

  1. गांधी जी का साबरमती आश्रम
    बहुत अच्छा लगा...
    आपके साथ तस्वीरों द्वारा देखना !!

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  2. बिलकुल सही कहा आपने ....चित्रों में दिख रही शान्ति बिलकुल जैसी मैंने करीब २० साल पहले देखी थी ....आभार

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  3. बहुत सुंदर चित्र. शुभकामनाएं.

    रामराम.

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  4. आपने चित्रों के माध्यम से हमें भी आश्रम के दर्शन करा दिए आभार

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  5. मैं सोच रहा हूँ कितनी शांति का अनुभव किया होगा यहाँ आपने

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  6. बिल्कुल देख कर ही लग रहा है कि वहाँ आज भी गांधी जी की आत्मा बसती है………………बहुत सुन्दर प्रस्तुति।

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  7. बापू के आवास के दर्शन हुए ..
    आभार ..!

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  8. बहुत सुंदर चित्र ओर अति सुंदर लेख धन्यवाद

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  9. गाँधी जयंती और शास्त्री जी का जनम दिन मुबारक ...

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  10. सुन्दर चित्रों के साथ शानदार लेख! बहुत अच्छा लगा साबरमती आश्रम देखकर! राष्ट्रपिता को नमन!

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  11. इस आश्रम में आकर वास्तव में ही अच्छा लगता है. यहां एक तरह की शांति पसरी रहती है हर ओर.

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  12. बहुत अच्छी प्रस्तुति। हार्दिक शुभकामनाएं!
    तुम मांसहीन, तुम रक्त हीन, हे अस्थिशेष! तुम अस्थिहीऩ,
    तुम शुद्ध बुद्ध आत्मा केवल, हे चिर पुरान हे चिर नवीन!
    तुम पूर्ण इकाई जीवन की, जिसमें असार भव-शून्य लीन,
    आधार अमर, होगी जिस पर, भावी संस्कृति समासीन।
    कोटि-कोटि नमन बापू, ‘मनोज’ पर मनोज कुमार की प्रस्तुति, पधारें

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  13. अपकी पोस्ट से बापू धाम के दर्शन हुए इसके लिये धन्यवाद।

    उत्तर देंहटाएं

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