ढल गयी उम्र तो, गीतों में रवानी आयी।
याद गुजरे हुए
लम्हों की कहानी आयी।।
जब भी छेड़ी है
मधुर तान किसी भँवरे ने,
शोख कलियों के
मुखौटों पे जवानी आयी।
जब भी आकाश पे
छायें हैं सघन-घन काले,
दिल में
ज़ज़्बात की बारात सुहानी आयी।
टूट जाते हैं
सभी ग़म के थपेड़े खाकर,
हमको बिगड़ी
हुई किस्मत न बनानी आयी।
मैं दिवानों
की तरह रोज़ ग़ज़ल लिखता हूँ,
किन्तु लिखनी
न अभी नज़्म पुरानी आई।
हमने जब
"रूप" को देखा तो होश खो बैठे,
क्या करें.
आँख भी उनसे न मिलानी आयी।
|
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बुधवार, 20 फ़रवरी 2013
"ग़ज़ल-लम्हों की कहानी" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
मंगलवार, 19 फ़रवरी 2013
"देश की कहानी" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
![]() (चित्र गूगल छवियों से साभार)
होश गुम हैं, जोश है मन में भरा,
यह हक़ीकत है, नहीं कोई कहानी।
अब यहाँ भी चल
पड़ा है दौर ऐसा,
सिर्फ शब्दों
में भरी सारी रवानी।।
खो गया है
गाँव का परिवेश सारा,
हर तरफ है शहर
का गन्दा नज़ारा,
घूमती चारों
तरफ बिगड़ी जवानी।
सिर्फ शब्दों
में भरी सारी रवानी।।
काठ भी तो बन
गया है अब सुचालक,
अब नहीं मासूम
लगता कोई बालक,
सभ्यता की अब
नहीं बाकी निशानी।
सिर्फ शब्दों
में भरी सारी रवानी।।
मन्दिरों में
आज भ्रष्टाचार फैला,
भक्त-भक्ति का
यहाँ उपहार मैला,
पड़ रही है
लाज मीरा को बचानी।
सिर्फ शब्दों
में भरी सारी रवानी।।
ज्ञान अब
बिकने लगा है हाट में,
मखमली पैबन्द
हैं अब टाट में,
लोकशाही में
सजी है ख़ानदानी।
सिर्फ शब्दों
में भरी सारी रवानी।।
|
सोमवार, 18 फ़रवरी 2013
"पत्थरों को तोड़ना" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
|
अब पढ़ाई और लिखाई छोड़ ना।
सीख ले अब पत्थरों को तोड़ना।।
काम मिलता ही नहीं है, शिक्षितों के वास्ते,
गुज़र करने के लिए, अवरुद्ध हैं सब रास्ते,
इस लिए मेहनत से नाता जोड़ ना।
सीख ले अब पत्थरों को तोड़ना।।
समय कटता है हमारा पत्थरों के साथ
में,
वार करने को जिगर पर हथौड़ा है हाथ
में.
देखकर नाज़ुक कलाई मोड़ ना।
सीख ले अब पत्थरों को तोड़ना।।
कोई रिक्शा खींचता है, कोई बोझा ढो रहा,
कोई पढ़-लिखकर यहाँ पर भाग्य को है
रो रहा,
आ हमारे साथ श्रम को ओढ़ ना।
सीख ले अब पत्थरों को तोड़ना।।
|
शनिवार, 16 फ़रवरी 2013
"मेरा एक पुराना गीत" (डॉ.रूपचन्द्र सास्त्री 'मयंक')
मेरे गीत को सुनिए-
अर्चना चावजी के मधुर स्वर में!
![]() सुख के बादल कभी न बरसे,
दुख-सन्ताप बहुत झेले हैं!
जीवन की आपाधापी में,
झंझावात बहुत फैले हैं!!
अनजाने से अपने लगते,
बेगाने से सपने लगते,
जिनको पाक-साफ समझा था, उनके ही अन्तस् मैले हैं!
जीवन की आपाधापी में,
झंझावात बहुत फैले हैं!!
बन्धक आजादी खादी में,
संसद शामिल बर्बादी में,
बलिदानों की बलिवेदी पर,
लगते कहीं नही मेले हैं!
जीवन की आपाधापी में,
झंझावात बहुत फैले हैं!!
ज्ञानी है मूरख से हारा,
दूषित है गंगा की धारा,
टिम-टिम करते गुरू गगन में,
चाँद बने बैठे चेले हैं!
जीवन की आपाधापी में,
झंझावात बहुत फैले हैं!!
|
"दो मुक्तक" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
हमारी अंजुमन में आज तनहाई का आलम है।
थपेड़े सहन करके भी सदा खामोश रहते हैं।
नदी के दो किनारों को कभी मिलना नहीं होता।
शुक्रवार, 15 फ़रवरी 2013
"आ गया बसन्त है" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
![]()
आरती उतार
लो,
आ गया बसन्त
है!
ज़िन्दग़ी
सँवार लो,
आ गया बसन्त
है!
खेत लहलहा
उठे,
खिल उठी
वसुन्धरा,
चित्रकार ने
नया,
आज रंग है
भरा,
पीत वस्त्र
धार लो,
आ गया बसन्त
है!
ज़िन्दग़ी
सँवार लो,
आ गया बसन्त
है!
शारदे के
द्वार से,
ज्ञान का
प्रसाद लो,
दूर हों
विकार सब,
शब्द का
प्रसाद लो,
धूप-दीप साथ
ले,
आरती उतार
लो!
आ गया बसन्त
है!
ज़िन्दग़ी
सँवार लो,
आ गया बसन्त
है!
माँ सरस्वती
से आज,
बिम्ब नये
माँग लो,
वन्दना के
साथ में,
भाव नये
माँग लो,
मातु से
प्रवाह की,
अमल-धवल धार
लो।
आ गया बसन्त
है!
ज़िन्दग़ी
सँवार लो,
आ गया बसन्त
है!
|
गुरुवार, 14 फ़रवरी 2013
"उमड़ा भीषण प्यार" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
दिल से मत तजना कभी,
प्रीत-रीत उदगार।
सारस से तुम सीख लो,
क्या होता है प्यार।१।
प्रेम दिवस पर लीजिए,
व्रत जीवन में धार।
पल-पल-हर पल कीजिए,
सच्चा-सच्चा प्यार।२।
एक दिवस के वास्ते,
उमड़ा भीषण प्यार।
प्रणय दिवस के बाद में,
बढ़ जाता तक़रार।३।
पूरे जीवन प्यार का,
उतरे नहीं खुमार।
जीवनसाथी से सदा,
करना ऐसा प्यार।४।
चहक रहे हैं बाग में,
कलियाँ-सुमन अनेक।
धीरज और विवेक से,
चुनना केवल एक।५।
सुख सरिता बहती रहे,
धार न हो अवरुद्ध।
निशि-दिन प्रेम प्रवाह से,
इसको करो समृद्ध।६।
मन-विचार मिल जाय जब,
समझो तभी बसन्त।
पल-प्रतिपल मधुमास है,
समझो आदि न अन्त।७।
चिकनी-चुपड़ी देखकर,मत टपकाओ लार।
सोच-समझकर ही सदा,
देना कुछ उपहार।८।
कंकड़-काँटों से भरी, नहीं राह अनुकूल।
लेकर प्रीत कुदाल को,
सभी हटाना शूल।९।
केशर-क्यारी को सदा, स्नेह सुधा से सींच।
पुरुष न होता उच्च है,
नारि न होती नीच।१०।
पश्चिम की है सभ्यता, प्रेमदिवस का वार।
लेकिन अपने देश में,
प्रतिदिन प्रेम
अपार।११।
जीवनभर ना मिट सके, बरसाओ वह रंग।
सिखलाओ संसार को,
प्रेम-प्रीत का ढंग।१२।
आडम्बर से युक्त है, प्रेमदिवस का खेल।
चमक-दमक में खो गया,
सुमनों का ये मेल।१३।
रँग भरने के वास्ते, आया है ऋतुराज।
मस्ती में डूबा हुआ,
सारा सभ्य समाज।१४।
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