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बुधवार, 20 फ़रवरी 2013

"ग़ज़ल-लम्हों की कहानी" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


ढल गयी उम्र तो, गीतों में रवानी आयी।
याद गुजरे हुए लम्हों की कहानी आयी।।

जब भी छेड़ी है मधुर तान किसी भँवरे ने,
शोख कलियों के मुखौटों पे जवानी आयी।

जब भी आकाश पे छायें हैं सघन-घन काले,
दिल में ज़ज़्बात की बारात सुहानी आयी।

टूट जाते हैं सभी ग़म के थपेड़े खाकर,
हमको बिगड़ी हुई किस्मत न बनानी आयी।

मैं दिवानों की तरह रोज़ ग़ज़ल लिखता हूँ,
किन्तु लिखनी न अभी नज़्म पुरानी आई।

हमने जब "रूप" को देखा तो होश खो बैठे,
क्या करें. आँख भी उनसे न मिलानी आयी।

21 टिप्‍पणियां:

  1. वाह वाह आदरणीय शास्त्री जी बहुत मस्त ग़ज़ल लिखी है दाद कबूल करें

    उत्तर देंहटाएं
  2. सुंदर ग़ज़ल...लम्हों में पिघलती हुई सी...
    ~सादर!!!

    उत्तर देंहटाएं
  3. वाह आदरणीय गुरुदेव श्री वाह आनंदम उर आनंद समा गया, लाजवाब ग़ज़ल हेतु ढेरों दिली दाद के साथ साथ हार्दिक बधाई भी स्वीकारें. सादर

    उत्तर देंहटाएं
  4. आदरणीय मान्यवर क्या गजल की प्रस्तुति की धन्य है आप की लेखनी.

    उत्तर देंहटाएं
  5. बहुत खूबसूरत भाव भरे हैं।

    उत्तर देंहटाएं
  6. बड़े नाजुक ख्याल लिए रचना |बहुत भावपूर्ण |
    आशा

    उत्तर देंहटाएं
  7. हमने जब "रूप" को देखा तो होश खो बैठे,
    क्या करें. आँख भी उनसे न मिलानी आयी।,,,,,

    लाजवाब ग़ज़ल के लिए मेरी और से दिली दाद कबूल फरमाए,,,

    उत्तर देंहटाएं
  8. दूर से वे लम्हे और स्पष्ट से दीखते हैं।

    उत्तर देंहटाएं
  9. आज तो बसन्‍त का असर दिख रहा है।

    उत्तर देंहटाएं
  10. आप की ये खूबसूरत रचना शुकरवार यानी 22 फरवरी की नई पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही है...
    आप भी इस हलचल में आकर इस की शोभा पढ़ाएं।
    भूलना मत

    htp://www.nayi-purani-halchal.blogspot.com
    इस संदर्भ में आप के सुझावों का स्वागत है।

    सूचनार्थ।

    उत्तर देंहटाएं
  11. वाह! बहुत खूब. इसी पर एक शेर मेरी ओर से आपको सादर भेंट:
    उम्र गुजर गयी रोटी के जद्दोजहद में "नीरज" ,
    याद नहीं मुझे कब बचपन आया, कब जवानी आयी.
    सादर
    नीरज कुमार 'नीर'
    www.kavineeraj.blogspot.in

    उत्तर देंहटाएं
  12. रंग देती है हिना पत्थर पे पिस जाने के बाद!

    उत्तर देंहटाएं

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