साहित्यकार समागम

मित्रों।
दिनांक 4 फरवरी, 2018 (रविवार) को खटीमा में मेरे निवास पर साहित्यकार समागम का आयोजन किया जा रहा है।

जिसमें हिन्दी साहित्य और ब्लॉग से जुड़े सभी महानुभावों का स्वागत है।

कार्यक्रम विवरण निम्नवत् है-
दिनांक 4 फरवरी, 2018 (रविवार)
प्रातः 8 से 9 बजे तक यज्ञ
प्रातः 9 से 9-30 बजे तक जलपान (अल्पाहार)
प्रातः 10 से अपराह्न 1 बजे तक - पुस्तक विमोचन, स्वागत-सम्मान, परिचर्चा (विषय-हिन्दी भाषा के उन्नयन में
ब्लॉग और मुखपोथी (फेसबुक) का योगदान।
अपराह्न 1 बजे से 2 बजे तक भोजन।
अपराह्न 2 बजे से 4 बजे तक कविगोष्ठी
अपराह्न 5 बजे चाय के साथ सूक्ष्म अल्पाहार तत्पश्चात कार्यक्रम का समापन।
(
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री का निवास, टनकपुर-रोड, खटीमा, जिला-ऊधमसिंहनगर (उत्तराखण्ड)
अपने आने की स्वीकृति अवश्य दें।
सम्पर्क-9368499921, 7906360576

roopchandrashastri@gmail.com

"उच्चारण" 1996 से समाचारपत्र पंजीयक, भारत सरकार नई-दिल्ली द्वारा पंजीकृत है। यहाँ प्रकाशित किसी भी सामग्री को ब्लॉग स्वामी की अनुमति के बिना किसी भी रूप में प्रयोग करना© कॉपीराइट एक्ट का उलंघन माना जायेगा।

मित्रों!

आपको जानकर हर्ष होगा कि आप सभी काव्यमनीषियों के लिए छन्दविधा को सीखने और सिखाने के लिए हमने सृजन मंच ऑनलाइन का एक छोटा सा प्रयास किया है।

कृपया इस मंच में योगदान करने के लिएRoopchandrashastri@gmail.com पर मेल भेज कर कृतार्थ करें। रूप में आमन्त्रित कर दिया जायेगा। सादर...!

और हाँ..एक खुशखबरी और है...आप सबके लिए “आपका ब्लॉग” तैयार है। यहाँ आप अपनी किसी भी विधा की कृति (जैसे- अकविता, संस्मरण, मुक्तक, छन्दबद्धरचना, गीत, ग़ज़ल, शालीनचित्र, यात्रासंस्मरण आदि प्रकाशित कर सकते हैं।

बस आपको मुझे मेरे ई-मेल roopchandrashastri@gmail.com पर एक मेल करना होगा। मैं आपको “आपका ब्लॉग” पर लेखक के रूप में आमन्त्रित कर दूँगा। आप मेल स्वीकार कीजिए और अपनी अकविता, संस्मरण, मुक्तक, छन्दबद्धरचना, गीत, ग़ज़ल, शालीनचित्र, यात्रासंस्मरण आदि प्रकाशित कीजिए।

यह ब्लॉग खोजें

समर्थक

शनिवार, 16 फ़रवरी 2013

"मेरा एक पुराना गीत" (डॉ.रूपचन्द्र सास्त्री 'मयंक')

मेरे गीत को सुनिए-
अर्चना चावजी के मधुर स्वर में!



सुख के बादल कभी न बरसे, 
दुख-सन्ताप बहुत झेले हैं!
जीवन की आपाधापी में,
झंझावात बहुत फैले हैं!!

अनजाने से अपने लगते,
बेगाने से सपने लगते,
जिनको पाक-साफ समझा था,
उनके ही अन्तस् मैले हैं!
जीवन की आपाधापी में,
झंझावात बहुत फैले हैं!!

बन्धक आजादी खादी में,
संसद शामिल बर्बादी में,
बलिदानों की बलिवेदी पर,
लगते कहीं नही मेले हैं!
जीवन की आपाधापी में,
झंझावात बहुत फैले हैं!!

ज्ञानी है मूरख से हारा,
दूषित है गंगा की धारा,
टिम-टिम करते गुरू गगन में,
चाँद बने बैठे चेले हैं!
जीवन की आपाधापी में,
झंझावात बहुत फैले हैं!!


16 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत बढ़िया स्वर -
    शब्द-भाव अतुलनीय -
    आभार गुरु जी ||

    उत्तर देंहटाएं
  2. गुरू जी ये तो पुराना भी नये से बढिया है

    उत्तर देंहटाएं
  3. ज्ञानी है मूरख से हारा,
    दूषित है गंगा की धारा,
    टिम-टिम करते गुरू गगन में,
    चाँद बने बैठे चेले हैं!
    जीवन की आपाधापी में,
    झंझावात बहुत फैले हैं!
    आभार ! बहुत सुन्दर और सार्थक रचना.

    उत्तर देंहटाएं
  4. बहुत सुन्दर गीत बन गया अर्चना जी की आवाज पा कर |

    आशा

    उत्तर देंहटाएं
  5. sundar geet, mohak swar, संसद शामिल बर्बादी में,
    बलिदानों की बलिवेदी पर,
    लगते कहीं नही मेले हैं!
    जीवन की आपाधापी में,
    झंझावात बहुत फैले हैं!!

    ज्ञानी है मूरख से हारा,
    दूषित है गंगा की धारा,
    टिम-टिम करते गुरू गगन में,
    चाँद बने बैठे चेले हैं!
    जीवन की आपाधापी में,
    झंझावात बहुत फैले हैं!!

    उत्तर देंहटाएं
  6. वाह बहुत खूब

    अर्चना जी आवाज़ का जादू भी चल गया :)

    उत्तर देंहटाएं
  7. जीवन की आपाधापी में,
    झंझावात बहुत फैले हैं!!
    बहुत ही बढियां और संवेदनामयी कविता...

    उत्तर देंहटाएं
  8. सही... झंझावात बहुत फैले हैं...~अर्थपूर्ण रचना सर!
    ~सादर!

    उत्तर देंहटाएं
  9. वाह!
    आपकी यह प्रविष्टि आज दिनांक 18-02-2013 को चर्चामंच-1159 पर लिंक की जा रही है। सादर सूचनार्थ

    उत्तर देंहटाएं
  10. अर्थपूर्ण, सुन्दर और सार्थक रचना ** बन्धक आजादी खादी में,
    संसद शामिल बर्बादी में,
    बलिदानों की बलिवेदी पर,
    लगते कहीं नही मेले हैं!
    जीवन की आपाधापी में,
    झंझावात बहुत फैले हैं!!

    उत्तर देंहटाएं

  11. मेरे गीत को सुनिए-
    अर्चना चावजी के मधुर स्वर में!



    सुख के बादल कभी न बरसे,
    दुख-सन्ताप बहुत झेले हैं!
    जीवन की आपाधापी में,
    झंझावात बहुत फैले हैं!!

    अनजाने से अपने लगते,
    बेगाने से सपने लगते,
    जिनको पाक-साफ समझा था,
    उनके ही अन्तस् मैले हैं!
    जीवन की आपाधापी में,
    झंझावात बहुत फैले हैं!!

    बन्धक आजादी खादी में,
    संसद शामिल बर्बादी में,
    बलिदानों की बलिवेदी पर,
    लगते कहीं नही मेले हैं!
    जीवन की आपाधापी में,
    झंझावात बहुत फैले हैं!!

    ज्ञानी है मूरख से हारा,
    दूषित है गंगा की धारा,
    टिम-टिम करते गुरू गगन में,


    बहुत खूब . !बहुत सुन्दर रूपकात्मक गीत .

    उत्तर देंहटाएं
  12. अच्छी रचना.....
    सुन्दर आवाज़.......

    सादर
    अनु

    उत्तर देंहटाएं

केवल संयत और शालीन टिप्पणी ही प्रकाशित की जा सकेंगी! यदि आपकी टिप्पणी प्रकाशित न हो तो निराश न हों। कुछ टिप्पणियाँ स्पैम भी हो जाती है, जिन्हें यथासम्भव प्रकाशित कर दिया जाता है।

LinkWithin

Related Posts with Thumbnails