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सोमवार, 15 जून 2015

दोहागीत "कितनी मैली हो गयी गंगा जी की धार" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

♥ दोहागीत ♥
बात-बात पर हो रही, आपस में तकरार।
कितनी मैली हो गयी, गंगा जी की धार।।
(१)
मज़बूरी में भा रहा, सबको आज विदेश।
खुदगर्ज़ी में खो गये, ऋषियों के सन्देश।।
कर्णधार में है नहीं, बाकी बचा जमीर।
भारत माँ के जिगर में, घोंप रहा शमशीर।।
आज देश में सब जगह, फैला भ्रष्टाचार।
कितनी मैली हो गयी, गंगा जी की धार।।
(२)
कुनबेदारी ने लिया, लोकतन्त्र का “रूप”।
सबके हिस्से में नहीं, सुखद गुनगुनी धूप।।
दल-दल के तो मूल में, फैला मैला पंक।
अब कैसे राजा हुए, कल तक थे जो रंक।।
कैसे भी हो आय हो, मन में यही विचार।
कितनी मैली हो गयी, गंगा जी की धार।।
(३)
ओढ़ लबादा हंस का, घूम रहे हैं बाज।
लूट रहे हैं चमन को, माली ही खुद आज।।
खूनी पंजा देखकर, सहमे हुए कपोत।
सूरज अपने को कहें, ये छोटे खद्योत।।
मन को अब भाती नहीं, वीणा की झंकार।
कितनी मैली हो गयी, गंगा जी की धार।।
(४)
आपाधापी की यहाँ, भड़क रही है आग।
पुत्रों के मन में नहीं, माता का अनुराग।।
बड़ी मछलियाँ खा रहीं, छोटी-छोटी मीन।
देशनियन्ता पर रहा, अब कुछ नहीं यकीन।।
छल-बल की पतवार से, कैसे होंगे पार,
कितनी मैली हो गयी, गंगा जी की धार।।

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