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बुधवार, 3 जून 2015

"चालू शेरों पर ही अक्सर ज्यादा दाद मिला करती है" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

कई मित्र टिप्पणियाँ अक्सर, 
सब रचनाओं पर देते हैं।

सुन्दर-बढ़िया लिख करके
निज जान छुड़ा भर लेते हैं।।

कुछ तो बिना पढ़े ही
केवल कॉपी-पेस्ट किया करते हैं।
खुश करने को बदले में ही, 
वो प्रतिदान दिया करते हैं।।

रचना के बारे में भी तो, 
कुछ ना कुछ लिख दिया करो।
आँख मूँद करएक तरह की
नहीं टिप्पणी किया करो।।

पोस्ट अगर मन को ना भाये, 
पढ़ो और आगे बढ़ जाओ।
बिल्कुल नहीं जरूरी, 
तुम बदले में उसको टिपियाओ।।

यदि ज्ञानी, विद्वान-सुभट हो, 
प्रेम-भाव से समझाओ।
अपमानित करने वाली, 
दूजों को सीख न सिखलाओ।।

श्रेष्ठ लेख या रचनाओं को, 
टिप्पणियों से मत मापो।
सत्संग और प्रवचनों को, 
घटिया गानों से मत नापो।।

जालजगत पर जबसे आये, 
तबसे ही यह मान रहे हैं।
टिप्पणियों के भूखे, 
गुणवानों को भी पहचान रहे हैं।।

दुर्बल पौधों को ही ज्यादा, 
पानी-खाद मिला करती है।
चालू शेरों पर ही अक्सर, 
ज्यादा दाद मिला करती है।।

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