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रविवार, 21 जून 2015

दोहे "पितृ-दिवस" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

पूज्य पिता जी आपका
वन्दन शत्-शत् बार।
बिना आपके है नहीं
जीवन का आधार।।
--
बचपन मेरा खो गया
हुआ वृद्ध मैं आज।
सोच-समझकर अब मुझे, 
करने हैं सब काज।।
--
जब तक मेरे शीश पर
रहा आपका हाथ।
लेकिन अब आशीष का
छूट गया है साथ।।
--
तारतम्य टूटा हुआ, उलझ गये हैं तार।
कौन मुझे अब करेगा, पिता सरीखा प्यार।।
--
माँ ममता का रूप है, पिता सबल आधार।
मात-पिता सन्तान को, करते प्यार अपार।।
--
सूना सब संसार है, सूना घर का द्वार।
बिना पिता जी आपके, फीके सब त्यौहार।।
--
तात मुझे बल दीजिएउठा सकूँ मैं भार।
एक-नेक बनकर रहेमेरा ये परिवार।।

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