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शुक्रवार, 26 जून 2015

ग़ज़ल "चाँद-तारों की बात करते हैंं" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

 
पाँव अपने ज़मीं पे धरते हैं
चाँद-तारों की बात करते हैं

ग़म के मारे ग़रीब गुलशन में
हम बहारों की बात करते हैं।

मस्त बहती नदी की मौजों से
हम किनारों की बात करते हैं

भीड़ उमड़ी हुई है मेले में
हम कतारों की बात करते हैं

“रूप पर हो रहे फिदा लाखों
हम हजारों की बात करते हैं

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