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शनिवार, 11 जुलाई 2015

ग़ज़ल "इशारे समझना" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

मलमल में लिपटे शरारे समझना
अगर हो सके तो इशारे समझना 

मेरे भाव अल्फाज बन बह रहे हैं 

नजाकत के नाज़ुक नजारे समझना 

शजर काट नंगा बदन कर रहे हैं  
मझधार को मत किनारे समझना 

समाया दिमागों में दूषित प्रदूषण 
दरिया नहीं इनको धारे समझना। 

कहर बो रहे हैं, जहर खा रहे हैं 
बशर ऐसे किस्मत के मारे समझना 

जो तूती की आवाज को मन्द कर दें 
उन्हें ढोल-ताशे , नगारे समझना 

धरा "रूप" नापाक का पाक ने है 
ये माथे की कालिख हमारे समझना  

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