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रविवार, 19 जुलाई 2015

दोहे "...पाक की, नीयत है नापाक" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

सत्य-अहिंसा-प्यार की, खिसक रही बुनियाद।
मामूली सी बात पर, होते वाद-विवाद।१।
--
होता है जनतन्त्र में, जब जनता का राज।
जनता के मन के नहीं, लोकतन्त्र में काज।२।
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देख दुर्दशा देश की, होता बहुत मलाल।
प्रजातन्त्र में खा रहे, नेता सारा माल।३।
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शिक्षा का तो हो गया, बिल्कुल बण्टाधार।
पढ़े-लिखो को हाँकते, अनपढ़ ढोल-गँवार।४।
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धनवानों के लिए हैं, जीवन के अध्याय।
निर्धन को मिलता नहीं, लोकतन्त्र में न्याय।५।
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चिकनी-चुपड़ी बात से, करते हैं आखेट।
भाषण से ही भर रहे, वो जनता का पेट।६।
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मँहगाई ने कर दिया, जनता को बदहाल।
अच्छे दिन कब आयेंगे, मन में यही सवाल।७।
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आये थे हरिभजन को, ओटन लगे कपास।
दिन-प्रतिदिन दम तोड़ता, जनता का विश्वास।८।
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जाते रोज विदेश को, देने को सन्देश।
लेकिन काम न आ सके, उनके कुछ उपदेश।९।
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मुर्ग-मुसल्लम जहाँ पर, कहलाता हो शाक।
वैसे ही उस पाक की, नीयत है नापाक।१०।
--
नीम करेला जगत में, कभी न मीठा होय।
मगर न छोड़े दुष्टता, पीकर निर्मल तोय।११। 

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