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मंगलवार, 7 जुलाई 2015

"गगन में मेघ हैं छाये" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

चमकती बिजुरिया चपला,
गगन में मेघ हैं छाये।
मिटाने प्यास धरती की,
जलद जल धाम ले आये।

धरा की घास थी सूखी,
त्वचा थी राख सी रूखी,
हुई घनघोर जब बारिस,
नदी-नाले उफन आये।
मिटाने प्यास धरती की,
जलद जल धाम ले आये।।

दिवस में छिप गया सूरज,
दबा माटी का उड़ता रज,
किसानों के लिए बादल,
सुधा का जाम ले आये।
मिटाने प्यास धरती की,
जलद जल धाम ले आये।।

लगी है झड़ी सावन की,
जगी है आग विरहिन की,
मिलन की आस में उनके,
हृदय के कुसुम मुरझाये।
मिटाने प्यास धरती की,
जलद जल धाम ले आये।।

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