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शनिवार, 4 जुलाई 2015

"घिर-घिर बादल आये रे" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


चौमासे में आसमान में, 

घिर-घिर बादल आये रे! 
श्याम-घटाएँ विरहनिया के, 
मन में आग लगाए रे!! 

उनके लिए सुखद चौमासा, 
पास बसे जिनके प्रियतम,
कुण्ठित हैं उनकी अभिलाषा, 
दूर बसे जिनके साजन ,
वैरिन बदली खारे जल को, 
नयनों से बरसाए रे! 
श्याम-घटाएँ विरहनिया के, 
मन में आग लगाए रे!!  

पुरवा की जब पड़ीं फुहारें, 
ताप धरा का बहुत बढ़ा, 
मस्त हवाओं के आने से , 
मन का पारा बहुत चढ़ा, 
नील-गगन के इन्द्रधनुष भी, 
मन को नहीं सुहाए  रे! 
श्याम-घटाएँ विरहनिया के, 
मन में आग लगाए रे!! 

जिनके घर पक्के-पक्के हैं, 
बारिश उनका ताप हरे, 
जिनके घर कच्चे-कच्चे हैं, 
उनके आँगन पंक भरे, 
कंगाली में आटा गीला, 
हर-पल भूख सताए रे! 
श्याम-घटाएँ विरहनिया के, 
मन में आग लगाए रे!!

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