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सोमवार, 27 जुलाई 2015

ग़ज़ल "वो पढ़ नही सकते" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

बहुत जज्बात ऐसे हैंजिन्हें वो गढ़ नही सकते 
हमें लिखने की आदत है, मगर वो पढ़ नही सकते

सफीना चलते-चलते ही, भँवर में फँस गया उनका
हमें मिलने की आदत है, मगर वो बढ़ नही सकते

समर में इश्क के वो तो, बिना हथियार के उतरे
हमें भिड़ने की आदत है, मगर वो लड़ नही सकते

जरा सा जाम पीते ही, उड़े वो आसमानों में
कठिन पर्वत की राहों पर, मगर वो चढ़ नही सकते

बड़ी ही शान से अपना, दिखाते “रूप” वो फिरते,
नगीनों को करीने से, मगर वो जड़ नहीं सकते

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