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रविवार, 20 दिसंबर 2015

"न कोई धर्म-न ईमान" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

रोटी है,
बेटी है,
बँगला है,
खेती है,

घपलों में 
घपले हैं
दिल काले हैं
कपड़े उजले हैं,

उनके भइया हैं,
इनके साले हैं,
जाल में फँस रहे,
कबूतर भोले-भाले हैं,

गुण से विहीन हैं
अवगुण की खान हैं
जेबों में रहते
इनके भगवान हैं

इनकी दुनिया का
नया विज्ञान है
दिन में इन्सान हैं
रात को शैतान हैं

परदा डालते हैं
भाषण से घोटालों पर
तमाचे भी पड़ते हैं
कभी-कभी गालों पर

आदत हो गई है
लातों के भूतों को
खाते हैं यदा-कदा
जनता के जूतों को

न कोई धर्म है
न ही ईमान है
मुफ्त में करते
नही अहसान हैं

हर रात को बदलते 
नये मेहमान है
हमारे देश के नेता
सचमुच महान हैं!

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