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शुक्रवार, 25 दिसंबर 2015

दोहे "कौन सुने फरियाद" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

कीर्ति भुलाकर कर दिया, अलग-थलग आजाद।
दल-दल के इस खेल में, कौन सुने फरियाद।।
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सिर्फ नाम का निलम्बन, मंशा है कुछ और।
सभी सयाने कह रहे, फँसा गले में कौर।।
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कहीं निशाना था मगर, लगा किसी की ओर।
उस पर गिरती गाज है, जो होता कमजोर।।
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पूछ रहा निर्दोष यह, मेरा कहाँ कुसूर।
घोटालों की जाँच का, होता है दस्तूर।।
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लोकतन्त्र में क्यों चले, तुगलक सा फरमान।
जाँच कराकर कीजिए, सबकी बन्द जुबान।।
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जिसने जीता ही नहीं, पिछला आम चुनाव।
उसको वित्त विभाग की, करी हवाले नाव।।
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भरे हुए हैं योग्यतम, संसद में कुछ लाल।
मुखिया की इस नीति पर, उठते आज सवाल।।

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