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बुधवार, 2 दिसंबर 2015

दोहे "उलझ रहे हैं तार" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


मतलब मायाजाल में, होते हैं व्यापार।
ताने-बाने के सभी, उलझ रहे हैं तार।।
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कैसे सागर पार हो, नाविक हैं मक्कार।
छोड़ रहे मझधार में, हाथों से पतवार।।
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सैर-सपाटे के लिए, होता है परदेश।
तुलना में परदेश की, अच्छा लगता देश।।
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मतदाताओं की रही, यादगार कमजोर।
चमत्कार से वोट के, चमके चाराखोर।।
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कल तक जल का पान कर, रोज रहे थे कोस।
गले वही आकर मिले, हो करके मदहोस।।
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लालटेन के सामने, शरमा गयी उजास।
तेज सामने देखकर, ठहरा नहीं विकास।।
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नस्लवाद के शब्द पर, हुए बिहारी लाल।
तन के बहते खून में, आया जोश-उबाल।।
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आरोपी को कर लिया, फिर से अंगीकार।
जगह-जगह होने लगी, उसकी जय-जयकार।।
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प्रजातन्त्र में है नहीं, कोई कहीं अछूत।
जो कल तलक कपूत था, अब हो गया सपूत।।

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