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सोमवार, 27 मार्च 2017

गीत "गाँवों का निश्छल जीवन" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

जब भी सुखद-सलोने सपने,  नयनों में छा आते हैं।
गाँवों के निश्छल जीवन कीहमको याद दिलाते हैं।

सूरज उगने से पहलेहम लोग रोज उठ जाते थे,
दिनचर्या पूरी करके हमखेत जोतने जाते थे,
हरे चने और मूँगफली केहोले मन भरमाते हैं।
गाँवों के निश्छल जीवन कीहमको याद दिलाते हैं।।

मट्ठा-गुड़ नौ बजते हीदादी खेतों में लाती थी,
लाड़-प्यार के साथ हमेंवह प्रातराश करवाती थी,
मक्की की रोटीसरसों का साग याद आते हैं।
गाँवों के निश्छल जीवन कीहमको याद दिलाते हैं।।

आँगन में था पेड़ नीम काशीतल छाया देता था,
हाँडी में का कढ़ा-दूध, ताकत तन में भर देता था,
खो-खो और कबड्डी-कुश्ती, अब तक मन भरमाते हैं।
गाँवों के निश्छल जीवन कीहमको याद दिलाते हैं।।

तख्ती-बुधका और कलमबस्ते काँधे पे सजते थे,
मन्दिर में ढोलक-बाजाखड़ताल-मँजीरे बजते थे,
हरे सिंघाड़ों का अब तकहम स्वाद भूल नही पाते हैं।
गाँवों के निश्छल जीवन कीहमको याद दिलाते हैं।।

युग बदलापहनावा बदलाबदल गये सब चाल-चलन,
बोली बदलीभाषा बदलीबदल गये अब घर आंगन,
दिन चढ़ने पर नींद खुलीजल्दी दफ्तर को जाते हैं।
गाँवों के निश्छल जीवन कीहमको याद दिलाते हैं।।

2 टिप्‍पणियां:

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