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शुक्रवार, 3 मार्च 2017

दोहे "मौसम है अनुकूल" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

 
 फागुन में लाया साथ में, रंगों का त्यौहार।।
होली में अच्छी लगे, प्यार और मनुहार।।
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गुझिया-मठरी साथ में, थाली में पकवान।
रंगों से बाजार में, सजी हुईं दूकान।।
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खेलो रंग-गुलाल से, होली का त्यौहार।
कीचड़, कालिख-पेंट से, बढ़ती है तकरार।।
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बासन्ती परिवेश में, उमड़ रहा है प्यार।
होली के हुड़दंग का, सिर पर भूत सवार।।
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पछुआ अब चलने लगी, सरदी गयी सिधार।
रवि की फसलें हो गयीं, खेतों में तैयार।।
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धानी धरती हो गयी, नीला है आकाश।
जंगल में मंगल हुआ, हँसने लगा पलाश।।
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उपवन में खिलने लगे, रंग-बिरंगे फूल।
प्यार बाँटने के लिए, मौसम है अनुकूल।।

3 टिप्‍पणियां:

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