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रविवार, 10 सितंबर 2017

गीत "सूखी मंजुल माला क्यों" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

गुम हो गया उजाला क्यों?
दर्पण काला-काला क्यों?

चन्दा गुम है, सूरज सोया
काट रहे, जो हमने बोया
तेल कान में डाला क्यों?

राज-पाट सिंहासन पाया
सुख भोगा-आनन्द मनाया
फिर करता घोटाला क्यों?

जब खाली भण्डार पड़े हैं
बारिश में क्यों अन्न सड़े हैं
गोदामों में ताला क्यों?

कहाँ गयीं सोने की लड़ियाँ
पूछ रही हैं भोली चिड़ियाँ
सूखी मंजुल माला क्यों?

जनता सारी बोल रही है
न्याय-व्यवस्था डोल रही है
दाग़दार मतवाला क्यों?

7 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों का आनन्द" में सोमवार 11 सितंबर 2017 को लिंक की गई है.................. http://halchalwith5links.blogspot.com आप सादर आमंत्रित हैं ,धन्यवाद! "एकलव्य"

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  2. आमजन के दिलों में उतरता आपका अत्यंत प्रभावशाली गीत आदरणीय शास्त्री जी। सरल शब्दावली में लिपटे गहरे भाव दूर-दूर तक अपनी आवाज़ ले जाते हैं। बधाई।

    उत्तर देंहटाएं
  3. वर्तमान का चिंतन करती एक अच्छी रचना ... सीधी दिल में उतरती हुयी ...

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  4. गहरा चिन्तन, समसामयिक रचना आदरणीय

    उत्तर देंहटाएं
  5. आदरणीय मयंक जी ----- आज कल के ज्वलंत प्रश्न बड़े ही मीठे शब्दों में पिरोकर सुंदर गीत रच दिया आपने | सरलता से भरी रचना सहजता से मन को छू जाती है | हर्दिक बधाई आपको -------

    उत्तर देंहटाएं

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