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रविवार, 17 सितंबर 2017

गीत "देवपूजन के लिए सजने लगी हैं थालियाँ" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


धान्य से भरपूर,

खेतों में झुकी हैं डालियाँ।
धान के बिरुओं ने,
पहनी हैं नवेली बालियाँ।।

क्वार का आया महीना,
हो गया निर्मल गगन,
ताप सूरज का घटा,
बहने लगी शीतल पवन,
देवपूजन के लिए,
सजने लगी हैं थालियाँ।
धान के बिरुओं ने,
पहनी हैं नवेली बालियाँ।।

सुमन-कलियों की चमन में,
डोलियाँ सजने लगीं,
भ्रमर गुंजन कर रहे,
शहनाइयाँ बजने लगीं,
प्रणय-मण्डप में मधुर,
बजने लगीं हैं तालियाँ।
धान के बिरुओं ने,
पहनी हैं नवेली बालियाँ।।

5 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों का आनन्द" में सोमवार 18 सितंबर 2017 को लिंक की गई है.................. http://halchalwith5links.blogspot.com आप सादर आमंत्रित हैं ,धन्यवाद! "एकलव्य"

    उत्तर देंहटाएं
  2. मनभावन सामायिक सृजन। बधाई आदरणीय शास्त्री जी।

    उत्तर देंहटाएं
  3. वाह!!!
    लाजवाब ,मनभावन अभिव्यक्ति...।।

    उत्तर देंहटाएं
  4. सुमन-कलियों की चमन में,
    डोलियाँ सजने लगीं,
    भ्रमर गुंजन कर रहे,
    शहनाइयाँ बजने लगीं,
    प्रणय-मण्डप में मधुर,
    बजने लगीं हैं तालियाँ।
    धान के बिरुओं ने,
    पहनी हैं नवेली बालियाँ।।

    पूरी की पूरी रचना बेहद अतुल्य। आपकी कलम के मुरीद हुये आदरणीय कविवर। नमन

    उत्तर देंहटाएं

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