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सोमवार, 24 दिसंबर 2018

दोहे "परमपिता का दूत" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

रोज-रोज आता नहीं, क्रिसमस का त्यौहार।
खुश हो करके बाँटिए, लोगों को उपहार।।
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दया-धर्म का जगत में, जीवित रहे निवेश।
यीसू सूली पर चढ़ा, देने यह सन्देश।।
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झंझावातों में रहा, जो जीवन परियन्त।
माँ मरियम की कोख से, जन्मा था गुणवन्त।।
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सदा अभावों में पला, लेकिन रहा सपूत।
एक पन्थ कहता उसे, परमपिता का दूत।।
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मान और अपमान से, जो भी हुआ विरक्त।
दुनिया उसकी ओर ही, हो जाती अनुरक्त।।
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परमपिता के नाम की, महिमा बड़ी अपार।
दीन-दुखी का ईश ही, करता बेड़ा पार।।
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जीवन में मंगल करें, सन्तों के उपदेश।
सर्व धर्म समभाव का, बना रहे परिवेश।।

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