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गुरुवार, 6 दिसंबर 2018

गीत "भवसागर भयभीत हो गया" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


जो लगता था कभी पराया,
वो ही अब मनमीत हो गया।
पतझड़ में जो लिखा तराना,
वो वासन्ती गीत हो गया।।

अच्छे लगते हैं अब सपने,
अनजाने भी लगते अपने,
पारस पत्थर को छू करके,
रिश्ता आज पुनीत हो गया।

मैंने जब सरगम को गाया,
उसने सुर में ताल बजाया,
गायन-वादन के संगम से,
मनमोहक संगीत हो गया।

उमर हो गयी कब की पूरी,
लेकिन चाहत पड़ीं अधूरी
आशाओँ के ज्वार उठे जब,
भवसागर भयभीत हो गया।

सुलझ गया है ताना-बाना,
पतझड़ लगने लगा सुहाना,
बासन्ती अब सुमन हो गये,

जीवन आशातीत हो गया।

1 टिप्पणी:

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