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शनिवार, 24 फ़रवरी 2018

गीत "धारण त्रिशूल कर दुर्गा बन" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

मित्रों।
आज घर की पुरानी अलमारी में 
जीर्ण-शीर्ण अवस्था में 
1970 से 1973 तक की 
एक पुरानी डायरी मिल गयी।
जिसमें मेरी यह रचना भी है-
फूलों की मुझको चाह नहीं,
मैं काँटों को स्वीकार करूँ।
चन्दन से मुझको मोह नहीं,
ज्वाला को अंगीकार करूँ।।

सागर पर जिनने पुल बाँधा,
नल-नील भले ही खो जाये।
मैं सिन्धु सुखाने वाले,
कुम्भज का आदर मनुहार करूँ।।
चन्दन से मुझको मोह नहीं,
ज्वाला को अंगीकार करूँ।।

अम्बर चाहे मत लौटा हमको,
महावीर, गौतम, गाँधी।
दे दे प्रताप. इन्दिरा, सुभाष,
मैं गोविन्दसिंह से प्यार करूँ।।
चन्दन से मुझको मोह नहीं,
ज्वाला को अंगीकार करूँ।।

अब नहीं चाहिए पांचाली,
खिँच गया चीर दुर्गा न बनी।
लक्ष्मीबाई को लौटा दे,
फिर अरिमुण्डों से हार भरूँ।।
चन्दन से मुझको मोह नहीं,
ज्वाला को अंगीकार करूँ।।

ले नूरजहाँ लाखों चाहे,
बस एक पद्मिनी ही दे दे।
चन्दन-अबीर समझूँ गुलाल,
माथे पर उसकी क्षार धरूँ।।
चन्दन से मुझको मोह नहीं,
ज्वाला को अंगीकार करूँ।।

काबा-काशी या यरूशलम,
बद्रीनारायण छोटे हैं।
हैं कुरूक्षेत्र-हल्दीघाटी,
इम्फाल तीर्थ सत्कार करू।।
चन्दन से मुझको मोह नहीं,
ज्वाला को अंगीकार करूँ।।

दे शूल जो बाणों पर चढ़कर,
नाचें सदैव गाण्डीवों पर।
जो जूड़ों पर चढ़ मुरझाते,
उन फूलों से क्या प्यार करूँ।।
चन्दन से मुझको मोह नहीं,
ज्वाला को अंगीकार करूँ।।

मोहन! बंशी की चाह नहीं,
दो देवदत्त या पाञ्चजन्य।
चरखा लो, चक्र सुदर्शन दो,
मैं प्रलयंकर गुंजार करूँ।।
चन्दन से मुझको मोह नहीं,
ज्वाला को अंगीकार करूँ।।

अब नहीं चाहिए चरण कमल,
दे दे अंगद का एक पाँव।
भू डोल उठे, अरि वक्षस पर,
मैं ऐसा वज्र प्रहार करूँ।।
चन्दन से मुझको मोह नहीं,
ज्वाला को अंगीकार करूँ।।

माँ सरस्वती वीणा रख कर,
धारण त्रिशूल कर दुर्गा बन।
तेरे चरणों में शीश झुका,
मैं अभिनन्दन शत बार करूँ।।
फूलों की मुझको चाह नहीं,
मैं काँटों को स्वीकार करूँ।
चन्दन से मुझको मोह नहीं,
ज्वाला को अंगीकार करूँ।।
  

7 टिप्‍पणियां:

  1. अत्यंत ओजपूर्ण,तेजस्वी रचना। सादर अभिवादन।

    उत्तर देंहटाएं
  2. वाह जोशपूर्ण,ओजस्वी रचना
    बेहतरीन प्रस्तुति.
    समय की मांग यही है.आज हमें दुर्गाओं की ही आवश्यकता है

    उत्तर देंहटाएं
  3. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल सोमवार (26-02-2018) को ) "धारण त्रिशूल कर दुर्गा बन" (चर्चा अंक-2893) पर भी होगी।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    राधा तिवारी


    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल सोमवार (19-02-2018) को <a
    href="http://charchamanch

    उत्तर देंहटाएं
  4. उल्लेखनीय

    जब आप गौतम को नकार रहे हो
    महावीर को नकार रहे हो
    कृष्ण की बांसुरी पसन्द नहीं

    तो फिर इतने जोश को सही दिशा कौन देगा।

    😁

    उत्तर देंहटाएं
  5. बहुत सुन्दर और प्रेरक रचना

    उत्तर देंहटाएं

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