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बुधवार, 14 फ़रवरी 2018

बाल कविता "ठेले पर बिकते हैं बेर" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

लगा हुआ है इनका ढेर।
ठेले पर बिकते हैं बेर।।

रहते हैं काँटों के संग।
इनके हैं मनमोहक रंग।।

जो हरियल हैं, वे कच्चे हैं।
जो पीले हैं, वे पक्के हैं।।
ये सबके मन को ललचाते।
हम बच्चों को बहुत लुभाते।।

शंकर जी को भोग लगाते।
व्रत में हम बेरों को खाते।। 

ऋतु बसन्त की मन भाई है।
अपनी बेरी गदराई है।। 


डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

1 टिप्पणी:

  1. आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 15.02.2018 को चर्चा मंच पर चर्चा - 2881 में दिया जाएगा

    धन्यवाद

    उत्तर देंहटाएं

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