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गुरुवार, 8 फ़रवरी 2018

दोहे "मिला कनिष्ठा अंगुली, होते हैं प्रस्ताव" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

प्रेमदिवससप्ताह का, दिवस दूसरा आज।
पश्चिम के अनुकरण का, बढ़ने लगा रिवाज।।
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कल गुलाब का दिवस था, आज दिवस प्रस्ताव।
लेकिन सच्चे प्रेम का, सचमुच दिखा अभाव।।
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राजनीति जैसा हुआ, आज प्रणय का खेल।
झूठे हैं प्रस्ताव सब, झूठा मन का मेल।।
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मिला कनिष्ठा अंगुली, होते हैं प्रस्ताव।
खींचातानी में भला, कैसे हो समभाव।।
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किया जिसे गत वर्ष था, दिल से अंगीकार।
उससे क्यों इस साल में, नहीं रहा अब प्यार।।
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पश्चिम का किरदार ले, बदल गये हैं लोग।
भोगवाद में लिप्त हो, छोड़ दिया है योग।।
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जीवनभर की प्रीत का, सिमट रहा आधार।
रासरंग के लिए ही, उमड़ रहा अब प्यार।।
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ऋतुओं का राजा हमें, देता है सन्देश।
दिल से सच्चे मिलन का, उपजाओ परिवेश।।
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छोड़ो ढोंग-ढकोसले, तजो पश्चिमी रीत।
अमर हमेशा जो रहे, वो होती है प्रीत।।
  

1 टिप्पणी:

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