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सोमवार, 22 अक्तूबर 2018

Goodbye! (अलविदा) by Richard Aldington (अनुवादकः डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

Goodbye! (अलविदा)
by Richard Aldington
काव्यमय भावानुवाद
अनुवादकः डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'
--
हाथों को हाथों में लेकर
दबा-दबा कर
धरती जैसी गर्मी दे दो।
इससे नस-नस में ताकत का
हो जायेगा नव अहसास।
नई ऊर्जा का तन-मन में
हो जायेगा तब आभास।।
और धरा की गन्ध,
कभी साँसों में आप बसाओ तो।
रसना में ले स्वाद कभी,
आनन में उसे घुमाओ तो।।
पीड़ा की शहनाई में,
हँसकर भी देखो।
उस जीवन की गहराई को
छूकर तो देखो।।
इसी भाव को अन्त समय तक
जीवित रखना होगा।
चिर आराम कब्र में कैसे
मिले परखना होगा।।

सुमन और जीवों का जीवन,
एक झटके में मर जाते हैं।
फिर भी सुमन रोज खिलते हैं,
खिलकर मुरझाते हैं।।
मीठा मांस नहीं हो सकता,
फूलों का रस बहुत मधुर।
पौशाकों से नहीं निकलता,
कभी जिन्दगी का मृदु सुर।।
कसम धरा की लेकर कहता,
आँख तुम्हारी लगती सुन्दर,
सेकिन शुचिता भरी हुई है,
सुमनों और धरा के अन्दर।।
इसी भाव को अन्त समय तक 
जीवित रखना होगा।
चिर आराम कब्र में कैसे?
मिले परखना होगा।।




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