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सोमवार, 29 अक्तूबर 2018

व्यंग्य गीत "श्लाघा मन-भाया करती है" (रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

मुझसे बतियाने को कोई,
चेली बन जाया करती है!
उसकी बातें सुनकर मुझको,
हँसी बहुत आया करती है!

जान और पहचान नही है,
देश-वेश का ज्ञान नही है,
टूटी-फूटी रोमन-हिन्दी,
हमें चिढ़ाया सा करती है!
तब मुझको बातों-बातों में,
हँसी बहुत आया करती है!

कोई बिटिया बन जाती है,
कोई भगिनी बन जाती है,
कोई-कोई तो बुड्ढे की,
साली कहलाया करती है!
तब मुझको बातों-बातों में,
हँसी बहुत आया करती है!

आँख लगी तो सपना आया,
आँख खुली तो मैंने पाया,
बिन सिर पैरों की लिखने से,
सैंडिल पड़ जाया करती हैं!
तब मुझको बातों-बातों में,
हँसी बहुत आया करती है!

जाल-जगत की महिमा न्यारी,
वाह-वाही लगती है प्यारी,
जालजगत पर सबको अपनी,
श्लाघा मन-भाया करती है!
तब मुझको बातों-बातों में,
हँसी बहुत आया करती है!

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