"उच्चारण" 1996 से समाचारपत्र पंजीयक, भारत सरकार नई-दिल्ली द्वारा पंजीकृत है। यहाँ प्रकाशित किसी भी सामग्री को ब्लॉग स्वामी की अनुमति के बिना किसी भी रूप में प्रयोग करना© कॉपीराइट एक्ट का उलंघन माना जायेगा।

मित्रों!

आपको जानकर हर्ष होगा कि आप सभी काव्यमनीषियों के लिए छन्दविधा को सीखने और सिखाने के लिए हमने सृजन मंच ऑनलाइन का एक छोटा सा प्रयास किया है।

कृपया इस मंच में योगदान करने के लिएRoopchandrashastri@gmail.com पर मेल भेज कर कृतार्थ करें। रूप में आमन्त्रित कर दिया जायेगा। सादर...!

और हाँ..एक खुशखबरी और है...आप सबके लिए “आपका ब्लॉग” तैयार है। यहाँ आप अपनी किसी भी विधा की कृति (जैसे- अकविता, संस्मरण, मुक्तक, छन्दबद्धरचना, गीत, ग़ज़ल, शालीनचित्र, यात्रासंस्मरण आदि प्रकाशित कर सकते हैं।

बस आपको मुझे मेरे ई-मेल roopchandrashastri@gmail.com पर एक मेल करना होगा। मैं आपको “आपका ब्लॉग” पर लेखक के रूप में आमन्त्रित कर दूँगा। आप मेल स्वीकार कीजिए और अपनी अकविता, संस्मरण, मुक्तक, छन्दबद्धरचना, गीत, ग़ज़ल, शालीनचित्र, यात्रासंस्मरण आदि प्रकाशित कीजिए।

यह ब्लॉग खोजें

समर्थक

बुधवार, 3 अक्तूबर 2018

प्रकाशन "साहित्य सुधा-अक्टूबर (प्रथम) में मेरी दो रचनाएँ"

साहित्यकारों की वेबपत्रिका
साहित्य की रचनास्थली
वर्ष: 3, अंक 46, अक्टूबर(प्रथम), 2018
में मेरी दो रचनाएँ
"तुम मौन-निमन्त्रण तो दे दो"  (गीत)
और एक बालकविता
"मास्साब मत पकड़ो कान"
जलने को परवाना आतुरआशा के दीप जलाओ तो।
कब से बैठा प्यासा चातुरगगरी से जल छलकाओ तो।।
 मधुवन में महक समाई है
कलियों में यौवन सा छाया,
मस्ती में दीवाना होकर
भँवरा उपवन में मँडराया,
मन झूम रहा होकर व्याकुलतुम पंखुरिया फैलाओ तो।
कब से बैठा प्यासा चातुरगगरी से जल छलकाओ तो।।
 मधुमक्खी भीने-भीने सुर में
सुन्दर राग सुनाती है,
सुन्दर पंखों वाली तितली भी
आस लगाए आती है,
सूरज की किरणें कहती हैखुलकर कलियों मुस्काओ तो।
कब से बैठा प्यासा चातुरगगरी से जल छलकाओ तो।।
 चाहे मत दो मधु का कणभर
पर आमन्त्रण तो दे दो,
पहचानापन विस्मृत करके
तुम मौन-निमन्त्रण तो दे दो,
काली घनघोर घटाओं में, तुम बिजली बन कर आओ तो।
कब से बैठा प्यासा चातुरगगरी से जल छलकाओ तो।।
मास्साब मत पकड़ो कान।

है जुकाम से बहुत थकान।।

सरदी से ठिठुरे हैं हाथ।
नहीं दे रहे कुछ भी साथ।।

नभ में छाये काले बादल।
भरा हुआ जिनमें शीतल जल।।

आज नहीं लिखने की मर्जी।
सेवा में भेजी है अर्जी।।

दया करो हे कृपानिधान!
छुट्टी दे दो अब श्रीमान।।

जल्दी से अब घर जाऊँगा।
चाय-पकौड़े मैं खाऊँगा।।

कल जब सूरज उग जायेगा।
समय सुहाना तब आयेगा।।

तब मैं आऊँगा स्कूल।
नहीं करूँगा कुछ भी भूल।।

2 टिप्‍पणियां:

केवल संयत और शालीन टिप्पणी ही प्रकाशित की जा सकेंगी! यदि आपकी टिप्पणी प्रकाशित न हो तो निराश न हों। कुछ टिप्पणियाँ स्पैम भी हो जाती है, जिन्हें यथासम्भव प्रकाशित कर दिया जाता है।

LinkWithin

Related Posts with Thumbnails