"उच्चारण" 1996 से समाचारपत्र पंजीयक, भारत सरकार नई-दिल्ली द्वारा पंजीकृत है। यहाँ प्रकाशित किसी भी सामग्री को ब्लॉग स्वामी की अनुमति के बिना किसी भी रूप में प्रयोग करना© कॉपीराइट एक्ट का उलंघन माना जायेगा।

मित्रों!

आपको जानकर हर्ष होगा कि आप सभी काव्यमनीषियों के लिए छन्दविधा को सीखने और सिखाने के लिए हमने सृजन मंच ऑनलाइन का एक छोटा सा प्रयास किया है।

कृपया इस मंच में योगदान करने के लिएRoopchandrashastri@gmail.com पर मेल भेज कर कृतार्थ करें। रूप में आमन्त्रित कर दिया जायेगा। सादर...!

और हाँ..एक खुशखबरी और है...आप सबके लिए “आपका ब्लॉग” तैयार है। यहाँ आप अपनी किसी भी विधा की कृति (जैसे- अकविता, संस्मरण, मुक्तक, छन्दबद्धरचना, गीत, ग़ज़ल, शालीनचित्र, यात्रासंस्मरण आदि प्रकाशित कर सकते हैं।

बस आपको मुझे मेरे ई-मेल roopchandrashastri@gmail.com पर एक मेल करना होगा। मैं आपको “आपका ब्लॉग” पर लेखक के रूप में आमन्त्रित कर दूँगा। आप मेल स्वीकार कीजिए और अपनी अकविता, संस्मरण, मुक्तक, छन्दबद्धरचना, गीत, ग़ज़ल, शालीनचित्र, यात्रासंस्मरण आदि प्रकाशित कीजिए।

यह ब्लॉग खोजें

समर्थक

गुरुवार, 4 अक्तूबर 2018

दोहे "छिन जाते हैं ताज" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

 
असली गाँधी ने किए, खूब कमाल-धमाल।
अब का गाँघी देश में, करता खूब बबाल।।

तब के गाँधी ने किया, देश दासता मुक्त।
अब का गाँधी है नहीं, शासन के उपयुक्त।।

तब के गाँधी को मिला, बापू का सम्मान।
अब गाँधी पप्पू बना, सहता है अपमान।।

बनकर उभरा देश में, जब भी तानाशाह।
किया प्रजा के तन्त्र ने, उसको सदा तबाह।।

प्रजा अगर अनुकूल हो, रहे सलामत राज।
सारे शासक पहनते, काँटों के ही ताज।।

नौकरशाहों पर यहाँ, कभी न करना नाज।
एक जरा सी चूक से, छिन जाते हैं ताज।।

मनमानी से शासकों, अब आ जाओ बाज।
लील लिए महँगाई ने, बड़े-बड़ों के राज।।

1 टिप्पणी:

  1. असली गाँधी ने किए, खूब कमाल-धमाल।
    अब का गाँघी देश में, करता खूब बबाल।।

    तब के गाँधी ने किया, देश दासता मुक्त।
    अब का गाँधी है नहीं, शासन के उपयुक्त।।

    तब के गाँधी को मिला, बापू का सम्मान।
    अब गाँधी पप्पू बना, सहता है अपमान।।

    बनकर उभरा देश में, जब भी तानाशाह।
    किया प्रजा के तन्त्र ने, उसको सदा तबाह।।

    प्रजा अगर अनुकूल हो, रहे सलामत राज।
    सारे शासक पहनते, काँटों के ही ताज।।

    नौकरशाहों पर यहाँ, कभी न करना नाज।
    एक जरा सी चूक से, छिन जाते हैं ताज।।

    मनमानी से शासकों, अब आ जाओ बाज।
    लील लिए महँगाई ने, बड़े-बड़ों के राज।।

    कहते जिस को श्री मान अब का गांधी आप ,

    नेहरू का अवशेष है मान लीजिये आप।

    करमचंद था महात्मा ,छद्म है ये अवशेष ,
    माँ बेटों ने छल लिया सारा अभि -निवेश।
    भोले को भी हांकता बम बम ये अवशेष
    समझे बैठा है अभी खुद को ये अखि -लेश।

    शास्त्री जी के दोहे नै परवाज़ भर रहें हैं ,सतसैया के पार ,इनका रूप अपार।
    satshariakaljio.blogspot.com
    veerubhai1947.blogspot.com
    veeruji005.blogspot.com
    veerujialami.blogspot.com

    उत्तर देंहटाएं

केवल संयत और शालीन टिप्पणी ही प्रकाशित की जा सकेंगी! यदि आपकी टिप्पणी प्रकाशित न हो तो निराश न हों। कुछ टिप्पणियाँ स्पैम भी हो जाती है, जिन्हें यथासम्भव प्रकाशित कर दिया जाता है।

LinkWithin

Related Posts with Thumbnails