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शनिवार, 14 सितंबर 2019

दोहे "श्रद्धा और श्राद्ध" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

सबके अपने ढंग हैं, सबके अलग रिवाज।
श्राद्ध पक्ष में कीजिए, विधि-विधान से काज।।
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श्रद्धा से ही कीजिए, निज पुरुखों को याद।
श्रद्धा ही तो श्राद्ध की, होती है बुनियाद।।
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मात-पिता को मत कभी, देना तुम सन्ताप।
पितृपक्ष में कीजिए, वन्दन-पूजा-जाप।।
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जिनके पुण्य-प्रताप से, रिद्धि-सिद्धि का वास।
उनका कभी न कीजिए, जीवन में उपहास।।
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वंशबेल चलती रहे, ऐसा वर दो नाथ।
पितरों का तर्पण करो, भक्ति-भाव के साथ।।
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अभ्यागत को देखकर, होना नहीं उदास।
पूरे श्रद्धाभाव से, रक्खो व्रत-उपवास।।
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जग में आवागमन का, चलता रहता चक्र।
अन्तरिक्ष में ग्रहों की, गति होती है वक्र।।
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अच्छे कामों को करो, सुधरेगा परलोक।
नेकी के ही कर्म से, फैलेगा आलोक।।
--

2 टिप्‍पणियां:

  1. जी नमस्ते,
    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (15-09-2019) को "लेइसी लिखे से शेयर बाजार चढ़ रहा है " (चर्चा अंक- 3459) पर भी होगी।


    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    आप भी सादर आमंत्रित है
    ….
    अनीता सैनी

    जवाब देंहटाएं
  2. बहुत अच्छी सामयिक प्रस्तुति

    जवाब देंहटाएं

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