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तुलसी सूर-कबीर की,
परम्परा है सुप्त।
कविता के आकाश से,
सन्त हो गये लुप्त।।
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कविताओं का नाम है,
लेकिन हैं आलेख।
छन्द बन्द ताबूत
में, ठुकी हुई गुलमेख।।
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कविताओं का अब
नहीं, रहा पुराना ढंग।
छन्दबद्ध रचनाओं
पर, लगा हुआ है जंग।।
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बदल गयी है सभ्यता,
बदल गया है काल।
परिवर्तन के दौर
में, कविता है बदहाल।।
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शिक्षा की दूकान
में, सिसक रहा है ज्ञान।
धन के बल पर तो
नहीं, मिटता है अज्ञान।।
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पाठन और पठन हुआ, पुस्तक
में मजबूर।
छात्र और शिक्षक
हुए, आलस में अब चूर।।
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पुत्र-पिता के अब
नहीं, मिलते यहाँ विचार।
पश्चिम के परिवेश
में, रँगे हुए परिवार।।
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बहुत सुन्दर डॉक्टर रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'.
जवाब देंहटाएंगुरुकुल बंद हो गए हैं और उनके स्थान पर जगह-जगह ज्ञान के फ़ास्ट-फ़ूड खोमचे खुल गए हैं.
पहले सूर्य पश्चिम में अस्त होता था, अब सब कुछ पश्चिम में ही उदित होता है.
शिक्षा की दूकान में, सिसक रहा है ज्ञान
जवाब देंहटाएंधन के बल पर तो नहीं, मिटता है अज्ञान
बहुत सुंदर और सटीक ,सादर नमन