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रविवार, 19 जुलाई 2020

दोहे "काँवड़ का व्यतिरेक" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


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कोरोना के रोग ने, छीन लिया आनन्द।
काँवड़ लाने के हुए, पथ सारे ही बन्द।।
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नर-नारी सब मानते, मन से जिन्हें सुरेश।
विध्न विनाशक के पिता, जय हो देव महेश।।
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सावन आया झूम के, पड़ती हैं बौछार।
बम-भोले की हो रही, अब तो जय-जयकार।।
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कोरोना ने कर दिया, काँवड़ का व्यतिरेक।
कैसे गंगा नीर से, शिव का हो अभिषेक।।
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आवाजाही बन्द है, आहत हुए सुधीर।
हर-हर के हरद्वार से, कैसे लायें नीर।।
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कोरोना बरसात में, देता है सन्देश।
अपने प्यारे वतन का, साफ करो परिवेश।।
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जो पीता है जहर को, उसका होता मान।
महादेव शिव बन गये, करके विष का पान।।
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घर में रह कर कीजिए, शिव-शंकर का ध्यान।
शंकर जी देंगे उसे, खुश होकर वरदान।।
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3 टिप्‍पणियां:

  1. नमस्ते,
    आपकी इस प्रविष्टि के लिंक की चर्चा सोमवार (20-07-2020) को 'नजर रखा करो लिखे पर' ( चर्चा अंक 3768) पर भी होगी।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्त्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाए।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    --
    -रवीन्द्र सिंह यादव

    जवाब देंहटाएं
  2. कांवड़ का सावन में विशेष महत्व है। अब लोग इस परम्परा को भूलते जा रहे हैं... ख़ास कर युवा पीढ़ी।
    आपके ये सभी दोहे इस परम्परा को स्मरण कराने में सक्षम हैं और युवापीढ़ी के लिए मार्गदर्शक हैं।
    सागर नमन 🙏💐

    जवाब देंहटाएं

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