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शुक्रवार, 31 जुलाई 2020

दोहे "गबन और गोदान" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

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निर्धनता के जो रहे, जीवनभर पर्याय।
लमही में पैदा हुए, लेखक धनपत राय।।
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आम आदमी की व्यथा, लिखते थे जो नित्य।
प्रेमचन्द ने रच दिया, सरल-तरल साहित्य।।
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जीवित छप्पन वर्ष तक, रहे जगत में मात्र।
लेकिन उनके साथ सब, अमर हो गये पात्र।।

फाकेमस्ती में जिया, जीवन को भरपूर।
उपन्यास सम्राट थे, आडम्बर से दूर।।
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उपन्यास 'सेवासदन', 'गबन' और 'गोदान'।
हिन्दी-उर्दू अदब पर, किया बहुत अहसान।।
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'रूठीरानी' को लिखा, लिक्खा 'मिलमजदूर'।
प्रेमचन्द मुंशी रहे, सदा मजे से दूर।।
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लेखन में जिसका नहीं, झुका कभी किरदार।
उस लमही के लाल को, नमन हजारों बार।।
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6 टिप्‍पणियां:

  1. दिव्यता को आपकी वीरुभाई के प्रणाम।

    veeruvageesh.blogsspot.com

    vageeshnand.blogspot.com

    nanhemunne.blogspot.com

    veerujan.blogspot.com

    बहुत आला दर्ज़ा आलमी कलम जनाब की ,आदाब अता करता हूँ।

    veeruji05.blogspot.com

    जवाब देंहटाएं
  2. बहुत सुंदर रचना। प्रेमचंद जी को नमन।

    जवाब देंहटाएं
  3. जी नमस्ते ,
    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा शनिवार (०१-०८ -२०२०) को 'बड़े काम की खबर'(चर्चा अंक-३७८०) पर भी होगी।
    आप भी सादर आमंत्रित है
    --
    अनीता सैनी

    जवाब देंहटाएं
  4. वाह बेहतरीन प्रस्तुति, मुंशी प्रेमचंद जी को शत् शत् नमन

    जवाब देंहटाएं
  5. उपन्यास 'सेवासदन', 'गबन' और 'गोदान'।
    हिन्दी-उर्दू अदब पर, किया बहुत अहसान।।
    --
    'रूठीरानी' को लिखा, लिक्खा 'मिलमजदूर'।
    प्रेमचन्द मुंशी रहे, सदा मजे से दूर।।... प्रेमचंद जी को इससे ज्यादा अच्छी श्रद्धांजल‍िऔर क्या हो सकती है

    जवाब देंहटाएं
  6. सुंदर चर्चा प्रस्तुति

    जवाब देंहटाएं

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